हाँ मैं एक मजदूर हूँ

कभी दृढ़ तो कभी मगरूर
तन और मन से मजबूत हूँ।

नहीं निराशा है जीवन में
मैं गैरत से भरपूर हूँ।

हाँ मैं एक मजदूर हूँ।

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गर हो बादशाह तुम महलों के
मैं उन दीवारों का शिल्पकार हूँ।

सुनो पुकारें उन भवनों की
मैं जिनका असल हकदार हूँ।

हाँ मैं एक मजदूर हूँ।

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नहीं है दरकार मुझे शोहरत की
रईसों की सोहबत से दूर हूँ।

नहीं है तलब मुझे सोने की
सोने की खानों मे मजदूर हूँ।

हाँ मैं एक मजदूर हूँ।
           
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क्यों शरम करें आओ श्रम करें
मैं भी तो एक श्रमिक हूँ।

मुफलिसी से है मेरी यारी
जिनका मैं सरदार हूँ।

आराम, शान-शौकत, सुकून
इन सब से मैं दूर हूँ।

हाँ मैं एक मजदूर हूँ।

रचयिता
सुबोध कुमार,
इं.प्र.अ.,
प्राथमिक विद्यालय नगला मढिया,
विकास खण्ड-शीतलपुर, 
जनपद-एटा।

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