माँ

धूप-छाँव की दीवारों से टकराकर,
जब जीवन की राहों से भटकने लगा।
खुद अंदर ही अंदर बिखरती रही,
फिर भी मुझे न बिखरने दिया।।
दुनिया का सब कुछ है तेरे ही चरणों में,
चाहे वो जन्नत हो, चाहे चारों धाम हो।
तेरी दुआओं से ही सब कुछ मिला,
चाहे कितना बड़ा जीवन का पैगाम हो।।
धैर्य त्याग समर्पण की मूरत है,
सारे जहां की जन्नत है।
उस ऊपर वाले से क्या माँगूँ,
जब तक माँ तेरी नेमत है।।
तेरे दूध का हक जीवन भर माँ,
मैं अदा नहीं कर पाऊँगा।
नाराज तुझे करके मैं माँ,
खुदा को मनाकर क्या पाऊँगा।।
दुनिया का कण-कण माँ का,
महिमामंडन करता है।
इसीलिए हर बच्चा-बच्चा,
अपनी माँ  पर इतराता है।।

रचयिता
अजय विक्रम सिंह, 
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय मरहैया,
विकास क्षेत्र-जैथरा,
जनपद-एटा।

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