मजदूरों की मजबूरी
मजदूरों की मजबूरी का खेल निराला है,
डट जाए कर्तव्य पथ पर सब कर जाता है।
प्रतिपल भीग पसीने से
काँटों में राह बनाता है
खेतों से खलिहानों तक
नई इबारत लिखता जाता है।
परिवारों के लालन - पालन में
गाँवों से शहरों की बाट बनाता है
अपने शिल्पी खून पसीने से
मंजिल दर मंजिल बनाता है।
मजदूरों की मजबूरी का खेल निराला है,
डट जाए कर्तव्य पथ पर सब कर जाता है।
हाँक - हाँक कर रिक्शा गाड़ी
पसीने से तर-बतर होता जाता है
पत्थर कोयला तोड़कर लाख बना
भठ्ठों पर पसीने से ईंट पकाता है।
कहाँ देखकर जीवन संघर्षों की मेहनतकश सूरज
अपनी तपिश से ठंडी बयार चलाता है
मजदूरों के नित नव शिल्पों के बदले
कौन पुरस्कृत कर उत्साह बढ़ाता है
पत्थर बनकर दु:ख दर्द झेलता
व्याकुल हो तिरस्कारों में मन बहलाता है।
ऊँचे रख सदा इरादे साहस कभी न खोता है
गिरकर उटता उठकर चलता साँसों से प्यास बुझाता है।
रचयिता
दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल,
प्रधानाध्यापक,
संविलियत विद्यालय सोनवल,
विकास खण्ड-लक्ष्मीपुर,
जनपद-महराजगंज।
डट जाए कर्तव्य पथ पर सब कर जाता है।
प्रतिपल भीग पसीने से
काँटों में राह बनाता है
खेतों से खलिहानों तक
नई इबारत लिखता जाता है।
परिवारों के लालन - पालन में
गाँवों से शहरों की बाट बनाता है
अपने शिल्पी खून पसीने से
मंजिल दर मंजिल बनाता है।
मजदूरों की मजबूरी का खेल निराला है,
डट जाए कर्तव्य पथ पर सब कर जाता है।
हाँक - हाँक कर रिक्शा गाड़ी
पसीने से तर-बतर होता जाता है
पत्थर कोयला तोड़कर लाख बना
भठ्ठों पर पसीने से ईंट पकाता है।
कहाँ देखकर जीवन संघर्षों की मेहनतकश सूरज
अपनी तपिश से ठंडी बयार चलाता है
मजदूरों के नित नव शिल्पों के बदले
कौन पुरस्कृत कर उत्साह बढ़ाता है
पत्थर बनकर दु:ख दर्द झेलता
व्याकुल हो तिरस्कारों में मन बहलाता है।
ऊँचे रख सदा इरादे साहस कभी न खोता है
गिरकर उटता उठकर चलता साँसों से प्यास बुझाता है।
रचयिता
दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल,
प्रधानाध्यापक,
संविलियत विद्यालय सोनवल,
विकास खण्ड-लक्ष्मीपुर,
जनपद-महराजगंज।

Comments
Post a Comment