माता
नारी की यह छवि निराली
जो माता कहलाती है
जीवन इसकी कोख में पलता
प्रेम का राग सुनाती है।
दुनिया में आने से पहले
रिश्ता हमसे रखने वाली
ख़ून से अपने सींच-सींचकर
भोजन आँचल धरने वाली
जान हथेली रख पीड़ा
प्रसव की भी सह जाती है
नव जीवन को जग में लाकर
तब माता कहलाती है।
जब हम बोल नहीं पाते
ढेरों बातें करती है
हँसी लाल की रूठ न जाए
इसी बात से डरती है
अधर रहे मुस्कान हमारी
तरह-तरह बहलाती है
नींद भी अपनी त्याग रात भर
लोरी हमें सुनाती है।
हाथ पकड़कर चलना सीखा
देखे कई नज़ारे हैं
तुम-सा कोई और न दूजा
घूम लिये जग सारे हैं
एक बात सौ बार पूछ लो
कभी नहीं झुंझलाती है
बालक की हर बात पर देखो
फूले नहीं समाती है।
यौवन इसका बीता सारा
बचपन जवाँ बनाने में
अपना सपना भूल गई है
सपने मेरे सजाने में
होकर निराश जब भी लौटा
सिर मेरा सहलाती है
हौंसलों के दे पंख नये
फिर से उड़ना सिखलाती है।
पूत कपूत हुए हैं जग में
माता नहीं कुमाता है
मात पुकारे वृद्धाश्रम से
क्यों बेटा नहीं बुलाता है
इतना सब कुछ देने वाली
क्या उम्मीद लगाती है
दूध पिलाया अपना जिसने
क्यों प्यासी मर जाती है।
गीत नहीं केवल शब्दों का
सच्ची है कहानी सुन
ईश्वर का यह रूप धरा पर
मत करना नादानी तुम
बदक़िस्मत होते हैं जिनको
यह गोद नहीं मिल पाती है
सच्चे मन से सेवा कर लो
मोक्ष-राह खुल जाती है।
रचयिता
तिलक सिंह,
सहायक अध्यापक,
उच्च प्राथमिक विद्यालय फुसावली,
विकास खण्ड-गंगीरी,
जनपद-अलीगढ़।
जो माता कहलाती है
जीवन इसकी कोख में पलता
प्रेम का राग सुनाती है।
दुनिया में आने से पहले
रिश्ता हमसे रखने वाली
ख़ून से अपने सींच-सींचकर
भोजन आँचल धरने वाली
जान हथेली रख पीड़ा
प्रसव की भी सह जाती है
नव जीवन को जग में लाकर
तब माता कहलाती है।
जब हम बोल नहीं पाते
ढेरों बातें करती है
हँसी लाल की रूठ न जाए
इसी बात से डरती है
अधर रहे मुस्कान हमारी
तरह-तरह बहलाती है
नींद भी अपनी त्याग रात भर
लोरी हमें सुनाती है।
हाथ पकड़कर चलना सीखा
देखे कई नज़ारे हैं
तुम-सा कोई और न दूजा
घूम लिये जग सारे हैं
एक बात सौ बार पूछ लो
कभी नहीं झुंझलाती है
बालक की हर बात पर देखो
फूले नहीं समाती है।
यौवन इसका बीता सारा
बचपन जवाँ बनाने में
अपना सपना भूल गई है
सपने मेरे सजाने में
होकर निराश जब भी लौटा
सिर मेरा सहलाती है
हौंसलों के दे पंख नये
फिर से उड़ना सिखलाती है।
पूत कपूत हुए हैं जग में
माता नहीं कुमाता है
मात पुकारे वृद्धाश्रम से
क्यों बेटा नहीं बुलाता है
इतना सब कुछ देने वाली
क्या उम्मीद लगाती है
दूध पिलाया अपना जिसने
क्यों प्यासी मर जाती है।
गीत नहीं केवल शब्दों का
सच्ची है कहानी सुन
ईश्वर का यह रूप धरा पर
मत करना नादानी तुम
बदक़िस्मत होते हैं जिनको
यह गोद नहीं मिल पाती है
सच्चे मन से सेवा कर लो
मोक्ष-राह खुल जाती है।
रचयिता
तिलक सिंह,
सहायक अध्यापक,
उच्च प्राथमिक विद्यालय फुसावली,
विकास खण्ड-गंगीरी,
जनपद-अलीगढ़।

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