इंसान कब खुश हुआ है

भागती दौड़ती थी ज़िन्दगी ...इंसान कैद था।
काम के बोझ के तले, कहाँ उसे अपने खाने पीने का होश था।।

अधूरी नींदों के साथ उठना, चंद पलों का भी ना सुकून था।
ना वक़्त अपनों के लिए निकाल पाता था और ना ही अपने ही लिए वक़्त था।।

अपने कामों में वो इतना मशरूफ होता था कि अपने ही घर में चंद घंटों का मेहमान होता था।

चाहता था वो, कुछ पल मिले कि जी सके वो भी खुलके बिना किसी बोझ तले।।
दिया कुदरत ने एक मौका ज़िन्दगी जीने का।

बिना किसी फिक्र के खुलके अपने घर में जीने का।।
जहाँ ज़रूरी ना कोई काम हो।

बस फुर्सत के पल हों और अपनों का साथ हो।।
पर इंसान कब खुश हुआ है?

जो नहीं मिलता ..उसकी "आस" लगाता है।
और....
जो मिलता है ... उसमें "काश" लगाता है।।

अब उसे वो दौड़ती - भागती ज़िन्दगी रास आ रही है।

जिस घर में वो आज़ाद था ,...
आज वही घर उसे काट रहा है।।

रचयिता
हिना सिद्दीकी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय कुंजलगढ़,
विकास खण्ड-कैंपियरगंज,
जनपद-गोरखपुर।


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