मेरी माँ
इतनी हैसियत तो नहीं मेरी
कि बयां करूँ तुझे लफ्जों में।
रिश्ता एहसासों का है तुझसे, लफ्जों का नहीं।।
हजारों लफ्ज़ हैं, पर सब बेकार हैं।
बयां करना है जिसको,
वो खुद में ही पूरा जहान है।।
एक दिन के लिए कैसे बोलूँ कि तू खास है;
जब मेरे हर दिन की तू शुरुआत है।
"मैं" हूँ , क्योंकि तू है;
तेरे होने से ही मैं हूँ।।
यूँ तो हर रोज़ नया सबक सिखाती है ज़िन्दगी;
पर ज़िन्दगी का सबसे पहला सबक, तूने सिखाया मुझे।
अपनी धड़कन को, मेरी धड़कन से जोड़कर, धड़काया था मुझे।
हर बुराई से बचाकर, अपनी कोख में छिपाया था मुझे।।
जिस दिन अपनी साँसों को, मेरी साँसों से जोड़ा था तूने;
उस दिन से खुद के लिए जीना छोड़ा था तूने।
मेरे कदमों की आहटों को सबसे पहले, तूने महसूस किया;
अपनी हर ज़रूरत से भी ज्यादा, मुझे ज़रूरी किया।
ना दिन का, ना रात का ख्याल; तुझे होता था।
मेरे रोने का शोर भी, तुझे सुकून देता था।।
पकड़ के उँगली, मुझे चलना सिखाया था;
गिरी जो मैं तो आँसू तेरी आँखों से आया था।।
देख के मुझको उदास, शिकन माथे पर उसके भी आती है;
खुश हूँ अगर मैं तो वो भी मुस्कुराती है।
वो जानती है कि थोड़ी लापरवाह हूँ मैं;
इसलिए खुद मुझसे पहले उठ, मुझे उठाती है।
बहुत जल्दी में रहती हूँ मैं, ये जानती है वो;
कहीं रह ना जाऊँ मैं भूखी, इसलिए मेरा टिफिन बांधती है वो।।
हो चुकी हूँ मैं अब बड़ी, ये बात वो कब मानती है;
"माँ" है वो ....
इसलिए हर पल मेरी फिक्र उसे सताती है।।
कि बयां करूँ तुझे लफ्जों में।
रिश्ता एहसासों का है तुझसे, लफ्जों का नहीं।।
हजारों लफ्ज़ हैं, पर सब बेकार हैं।
बयां करना है जिसको,
वो खुद में ही पूरा जहान है।।
एक दिन के लिए कैसे बोलूँ कि तू खास है;
जब मेरे हर दिन की तू शुरुआत है।
"मैं" हूँ , क्योंकि तू है;
तेरे होने से ही मैं हूँ।।
यूँ तो हर रोज़ नया सबक सिखाती है ज़िन्दगी;
पर ज़िन्दगी का सबसे पहला सबक, तूने सिखाया मुझे।
अपनी धड़कन को, मेरी धड़कन से जोड़कर, धड़काया था मुझे।
हर बुराई से बचाकर, अपनी कोख में छिपाया था मुझे।।
जिस दिन अपनी साँसों को, मेरी साँसों से जोड़ा था तूने;
उस दिन से खुद के लिए जीना छोड़ा था तूने।
मेरे कदमों की आहटों को सबसे पहले, तूने महसूस किया;
अपनी हर ज़रूरत से भी ज्यादा, मुझे ज़रूरी किया।
ना दिन का, ना रात का ख्याल; तुझे होता था।
मेरे रोने का शोर भी, तुझे सुकून देता था।।
पकड़ के उँगली, मुझे चलना सिखाया था;
गिरी जो मैं तो आँसू तेरी आँखों से आया था।।
देख के मुझको उदास, शिकन माथे पर उसके भी आती है;
खुश हूँ अगर मैं तो वो भी मुस्कुराती है।
वो जानती है कि थोड़ी लापरवाह हूँ मैं;
इसलिए खुद मुझसे पहले उठ, मुझे उठाती है।
बहुत जल्दी में रहती हूँ मैं, ये जानती है वो;
कहीं रह ना जाऊँ मैं भूखी, इसलिए मेरा टिफिन बांधती है वो।।
हो चुकी हूँ मैं अब बड़ी, ये बात वो कब मानती है;
"माँ" है वो ....
इसलिए हर पल मेरी फिक्र उसे सताती है।।
रचयिता
हिना सिद्दीकी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय कुंजलगढ़,
विकास खण्ड-कैंपियरगंज,
जनपद-गोरखपुर।

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