श्रम का सेवक

अपने स्वेद कणों से जग के स्वप्न सजाता हूँ,
वर्षा धूप देह पर हँसकर झेल भी जाता हूँ।
श्रम मेरी शक्ति है, श्रम जीवनयापन का साधन,
श्रम का सेवक हूँ गर्व से श्रमिक कहाता हूँ।
हाथ फावड़े और टोकरी कभी नहीं छोड़े हैं,
कभी धूप में बाँध मुरेठा पत्थर तोड़े हैं,
शौक नहीं बंगले गाड़ी का,
फ़िक्र सिर्फ रोटी की,
बाँध कारखाने मैं ही दिन रात बनाता हूँ।
 श्रम का सेवक हूँ गर्व से श्रमिक कहाता हूँ।
 मेरी आँखों में भी अच्छे दिन के सपने हैं,
इंतजार करते मेरे भी घर पर अपने हैं, 
यह संसार सजाया मेरे जैसे ही हाथों ने,
 मैं अपने जीवन में भी उम्मीद जगाता हूँ,
श्रम का सेवक हूँ गर्व से श्रमिक कहाता हूँ।

रचयिता
कुहू बनर्जी,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अटकोहना,
विकास खण्ड-नकहा,
जनपद-लखीमपुर खीरी।

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