माँ

मत्त गयन्द सवैया
7 भगड़ अन्त में 2 गुरु समतुकांत

प्यार करे दिन रात हमें वह
    मात जिसे हम नाम दिये हैं।।
जीवन नेह लुटाकर आपन
    पालन में दिन रात दिये हैं।।

भोर भये सब काम किये तब
    बालक मात जगाय रही है।।
हाथ फिरात शिखा सहलावत
    मस्तक चूम हिलाय रही है।।

बालक मात सदा हिय भावत
    सो कछु आज बनाय रही है।।
हाथ खिलाकर नेह लड़ाकर
    जीवन  नेह  लुटाय  रही है।।

पूर हुये सब मोर मनोरथ
    मात गले  हम  लाग रहे हैं।।
माँ रखना निज ओट सदा तुम
    माँ पर जान  निसार रहे हैं।।
         
रचयिता
गुंजन शुक्ला, 
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय गणेशपार्क,
विकास खण्ड-औरैया,
जनपद -औरैया।

Comments

  1. बहुत सुन्दर भाव और रचना

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  2. क्या बात है मेम अतिसुंदर रचना

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