मैं नारी हूँ
मैं ही इस धरा-धर्म की आशा हूँ,
मैं ही प्रेम-प्यार की परिभाषा हूँ।
मैं ही स्नेह और ममता का सागर हूँ,
मैं ही जननी जगपालनहार हूँ।।
मै माँ, बेटी, पत्नी, बहन कहलाती हूँ,
मैं दो कुलों की शान बन जाती हूँ।
मैं अपनों को पहले खिलाती हूँ,
मैं कभी-कभी खुद भूखे सो जाती हूँ।।
मैं इस पुन्य वसुंधरा की माटी हूँ,
मैं सदा प्रेम की फसल उगाती हूँ।
मैं सावन के झूलों का सुंदर गीत हूँ,
मैं जीवन रंग का मधुर संगीत हूँ।।
मैं ही सभ्यता और रीति-रिवाज हूँ,
मैं ही जग में पुरुषों का स्वाभिमान हूँ।
मैं ही निर्मित करती सभ्य समाज हूँ,
मै अब अबला नहीं स्वयं आत्मनिर्भर हूँ।।
मैं हर परिस्थिति में खुद लेती ढाल हूँ,
मैं पावन गंगा जीवन करती निहाल हूँ।
मै सावित्री सी सती, बनती पति की ढाल हूँ,
मैं मूरत त्याग की प्रेम दया का भंडार हूँ।।
मैं ही प्रेम-प्यार की परिभाषा हूँ।
मैं ही स्नेह और ममता का सागर हूँ,
मैं ही जननी जगपालनहार हूँ।।
मै माँ, बेटी, पत्नी, बहन कहलाती हूँ,
मैं दो कुलों की शान बन जाती हूँ।
मैं अपनों को पहले खिलाती हूँ,
मैं कभी-कभी खुद भूखे सो जाती हूँ।।
मैं इस पुन्य वसुंधरा की माटी हूँ,
मैं सदा प्रेम की फसल उगाती हूँ।
मैं सावन के झूलों का सुंदर गीत हूँ,
मैं जीवन रंग का मधुर संगीत हूँ।।
मैं ही सभ्यता और रीति-रिवाज हूँ,
मैं ही जग में पुरुषों का स्वाभिमान हूँ।
मैं ही निर्मित करती सभ्य समाज हूँ,
मै अब अबला नहीं स्वयं आत्मनिर्भर हूँ।।
मैं हर परिस्थिति में खुद लेती ढाल हूँ,
मैं पावन गंगा जीवन करती निहाल हूँ।
मै सावित्री सी सती, बनती पति की ढाल हूँ,
मैं मूरत त्याग की प्रेम दया का भंडार हूँ।।
रचयिता
नवनीत शुक्ल,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय भैरवां द्वितीय,
शिक्षा क्षेत्र-हसवा,
जनपद-फतेहपुर।

👌👌
ReplyDeleteसुन्दर रचना
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