माँ

(1)- जीवन में, विपत्ति की,
       घड़ी का भान होने पर।
       बचपन की, खुशियों का,
        महज अभिमान होने पर।
     पटल मस्तिष्क पर छा जाती,
जो कभी आँचल में  छिपाती थी।
        सीख अब भी सिखाती है,
      जो मुझे  दुनिया दिखाई थी।।

(2)- ईश्वर को नहीं देखा,
      उन्हें तुमसे ही जाना हूँ।
     जगत के  सप्तरंगों को,
     तेरी अक्षि से  पहचाना हूँ।
      कदम अपना स्वयं जब-जब,
       गलत मैने- बढ़ाया है।
     गुरू बनके मेरी जननी,
     राह तुमने दिखाया है।।

(3)- तुम्हीं तो हो मेरी ईश्वर,
     तुम्हीं मेरी तो मैया हो।
     तुम्हीं जग में मुझे लाईं,
     तुम्हीं मेरी कन्हैया हो।
      अभागा पुत्र हूँ तेरा,
      सुख में भूल जाता हूँ,
      विपत्ति जब घेर लेती है,
      जगह आँचल में  पाता हूँ।।

(4)- माँ तुम प्रेम की मूरत,
       नमन शतवार है  मेरा।
       चरण रज प्राप्त हो प्रतिदिन,
       यही सौभाग्य हो मेरा।
       विनय विधि  से बहुत मेरी,
       माँ सबकी शतायु  हो।
       कृपा हो माँ की जायो पर,
        तनुज भी दीर्घायु हो।।
     
रचयिता
सन्तोष कुशवाहा,
विज्ञान शिक्षक,
कन्या पूर्व माध्यमिक विद्यालय मनिहारी,
विकास क्षेत्र-मनिहारी, 
जनपद-गाजीपुर। 
           एवं 
ब्लॉक स्काउट मास्टर मनिहारी/ब्लॉक खेल प्रभारी मनिहारी गाजीपुर, जिला समन्वयक स्पेशल ओलंपिक भारत।

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