बालश्रम

वो चाय पिलाने वाला भी,
किसी आँख का तारा होगा।
वो पंचर जोड़ने वाला भी तो,
माँ का बड़ा दुलारा होगा।।

इनकी आँखों में भी तो कुछ,
नये पुराने सपने होंगे।
इन्हें लाड़-लड़ाने वाले भी तो,
इनके कुछ अपने होंगे।।

इन फूलों के ना खिलने का,
कुछ ना कुछ तो कारण होगा।
इनके कष्टों का भी,
कभी न कभी निवारण होगा।।

दो रोटी की खातिर इनको,
कब तक यूँ रगड़ना होगा।
यदि तस्वीर बदलनी है तो,
इनको भी तो पढ़ना होगा।।

रचनाकार
बृजराज सारस्वत,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय-गोपालगढ़,
विकास खण्ड व जनपद-मथुरा।

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