आधुनिक भारत में प्राथमिक शिक्षा का विकास(स्वतंत्रता से पूर्व)
भाग-3
ब्रिटिश व्यापारियों द्वारा
स्थापित ईस्ट इण्डिया कंपनी लगभग सन 1600 ईस्वी में भारत मे व्यापार करने आयी थी।
लगभग ड़ेढ शताब्दी तक कम्पनी अपने अस्तित्व के लिए अन्य यूरोपीय व्यापारिक संस्थाओं
तथा भारतीय राजाओं के साथ झगड़ों में उलझी एक विशुद्ध व्यापारिक संस्था थी। सन 1757
में प्लासी के युद्ध मे क्लाइव के विजय से बंगाल का शासन अंग्रेजों के हाथों में आ
गया और इसके बाद धीरे -धीरे सम्पूर्ण भारत वर्ष में ईस्ट इण्डिया कंपनी का अधिकार
हो गया। 1857 में ब्रिटिश शासन ने भारत का शासन अपने अधिकार में ले लिया। इस काल में प्राथमिक शिक्षा का विकास निम्नलिखित क्रम के अनुसार हुआ -
1- 1813 का आज्ञा
पत्र - इस "आज्ञा पत्र" ने कंपनी पर भारतीयों की शिक्षा
का उत्तरदायित्व रखा। भारत पर शासन करने संबंधी आज्ञा -पत्र का नवीनीकरण किया तथा
अधिनियम की धारा 43 में प्रावधान किया गया कि कम्पनी द्वारा प्रतिवर्ष 1 लाख या
अधिक रुपये भारत के विद्वान निवासियों के उत्साहवर्धन, साहित्य
के विकास एवम पुनरोत्थान के लिए व्यय किया जाएगा।
2- मैकॉले का विवरण
पत्र - (1835 ) लार्ड मैकॉले का विवरण पत्र आधुनिक भारतीय शिक्षा के
क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। मैकॉले भारत मे ऐसे नागरिकों का निर्माण
करना चाहते थे जो रक्त और वर्ण में भारतीय हो किंतु रुचि, विचार, नैतिकता और मानसिक
रूप में अंग्रेज हो।
3- वुड का घोषणा
पत्र (1854) - इस घोषणा पत्र के द्वारा सम्पूर्ण देश मे क्रमबद्ध शिक्षा
संस्थाओं की योजना लागू की तथा सहायता प्रणाली का सूत्रपात किया गया लेकिन इसके
साथ ही साथ इस घोषणा पत्र द्वारा धार्मिक शिक्षा को सदैव के लिए शिक्षा से अलग कर
प्राचीन भारतीय शिक्षा के आदर्शों की बुनियाद को हिला दिया गया।
4 - लार्ड स्टैनले
का आदेश पत्र 1856 - इस आदेश पत्र के द्वारा भारत सरकार को प्राथमिक शिक्षा
का उत्तरदायित्व ग्रहण करने का आदेश दिया और उसके व्यय की पूर्ति के लिए अनिवार्य
स्थानीय कर लगाने का आदेश दिया गया। स्टैनले के आदेश पत्र ने प्राथमिक शिक्षा को
नव- जीवन प्रदान किया जिससे प्राथमिक शिक्षा ने विस्तार के युग मे प्रवेश किया।
5- हण्टर कमीशन (1882)
- इस कमीशन की सिफारिश के अनुसार प्राथमिक शिक्षा में प्रगति हुई। सरकार ने
प्राथमिक शिक्षा का उत्तरदायित्व नगर पालिकाओं, जिला परिषदों तथा स्थानीय निकायों को सौप दिया। कालान्तर
में धनाभाव की समस्या से उलझी स्थानीय संस्थाओं से प्राथमिक शिक्षा के प्रसार के
लिए धन - प्राप्ति की आशा करना व्यर्थ था जिसका परिणाम यह हुआ कि देश के अधिकांश
बच्चे प्राथमिक शिक्षा से वंचित रह गए।
6- बड़ौदा नरेश का
प्रयास - 1906 में बड़ौदा नरेश ने एक अधिनियम बनाकर अपने राज्य में 7 से
10 वर्ष तक के सभी बालक एवम बालिकाओं के लिए प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क एवम
अनिवार्य बना दिया।
7- वर्धा शिक्षा
योजना - 1937 में गांधी जी
ने वर्धा में एक सम्मेलन बुलाया जिसमें उन्होंने बेसिक शिक्षा योजना की नवीन योजना
प्रस्तुत करते हुए कहा कि "देश की वर्तमान शिक्षा पद्धति किसी भी तरह से देश
की आवश्यकताओं की पूर्ति नही कर सकती। अतः प्राथमिक शिक्षा का पाठ्यक्रम कम से कम
7 साल का हो जिसके द्वारा मैट्रिक तक का ज्ञान दिया जा सके पर उसमे अंग्रेजी के
स्थान पर कोई अच्छा उद्योग जोड़ दिया जाए।
8- सार्जेन्ट
रिपोर्ट 1944 - भारतीय शिक्षा व्यवस्था में इस रिपोर्ट का मुख्य स्थान
है। इस योजना में पहली बार 6 से 14 वर्ष की आयु के बालको के लिए अनिवार्य प्राथमिक
शिक्षा का प्रावधान किया गया था। इस संबंध में के.जी. सैय्यदन का मत है कि
"सार्जेन्ट रिपोर्ट राष्ट्रीय शिक्षा की प्रथम व्यापक योजना है। यह इस धारणा
को स्वीकार नहीं करती कि भारत शिक्षा के क्षेत्र में अन्य राष्ट्रों से सदैव निम्न
स्तर पर रहेगा, यह इस विश्वास पर आधारित है कि अन्य देशों
ने शिक्षा के क्षेत्र में जो सफलता प्राप्त की है, उसे प्राप्त करने की इस देश मे भी पर्याप्त
क्षमता है।"
उपरोक्त अध्यनोपरान्त हम कह
सकते है कि आधुनिक भारत मे स्वतंत्रता से पूर्व प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था न तो
समुन्नत थी और न ही ये सार्वभौमिक बन सकी जिसके फलस्वरूप सभी बालकों को अनिवार्य
एवम निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने का उदेद्श्य अधूरा रह गया।
लेखिका
डॉ0 उषा सिंह,
प्रधानाध्यापिका,
इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल चकताली,
शिक्षा क्षेत्र-सिरकोनी,
जनपद-जौनपुर।
जनपद-जौनपुर।

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