माता-पिता का वैश्विक दिवस
हमारे जीवन में लोगों का आना,
आना फिर आकर के चले जाना।
इसका भी एक मकसद होता है,
पाकर हो खुश तो खोकर रोता है।।
कुछ हमें परखते और आजमाते हैं,
कुछ हमसे सीखते कुछ हमें सिखाते हैं।
कुछ केवल हमसे प्यार निभाने आते हैं,
कुछ चार कदम पर ही साथ छोड़ जाते हैं।।
कुछ हमारे जीवन में पूर्णता लाते हैं,
तो कुछ जीवन की बगिया सजाते हैं।
कुछ बन नश्तर हमको ही चुभ जाते हैं,
कुछ मरहम का रिश्ता निभाते हैं।।
कुछ हमारा इस्तेमाल करते है,
तो कुछ तुम्हें जीने का मतलब बताते हैं।
अब हम पर करता है सब निर्भर,
किसको दिल से किसको दिमाग से निभाते हैं।।
केवल एक रिश्ता जग में दिल का है,
जो जीवन भर हमारा साथ निभाता है।
हम एक बार को छोड़ भी दें उनको,
पर वो हमारा मोह ना तोड़ पाता है।।
गलती पर मारते भी हैं हमको,
हाथ प्यार का सिर पर उन्हीं का आता है।
भगवान सरीखा है वो एकलौता रिश्ता,
जो माता-पिता कहलाता है।।
यही जीवन भर मीत बनकर रहता है,
कुछ हमें समझाता है कुछ सुनता है।
ये ही वो रिश्ता जो न तो हमें परखता,
और न ही हमें कभी भी आजमाता है।।
जीते जी कदर किया करो उनकी,
जो हैं तुम्हें इस जग में लायें,
खुद कितनी भी पीड़ा में हो?
फिर जो तुम्हें देख-देख मुस्काये।।
एक बार जो वो चलें जाएँगे,
फिर कभी ना वापस आएँगे।
उसे पता चलेगी उनकी कीमत,
फिर हम केवल पछता ही पाएँगे।।
यही रिश्ता है वो अनमोल हीरा,
जिसका कोई मोल नहीं।
सब रिश्ते मिल जाते हैं जग में,
जिनको तुम लो तोल कहीं।।
रचयिता
ब्रजेश सिंह,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय बीठना,
विकास खण्ड-लोधा,
जनपद-अलीगढ़।

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