पर्यावरण दिवस
पर्यावरण हमें रहा पुकार,
वृक्षारोपण का माँगे उपहार।
हरी-भरी जब धरती होगी,
कमी नहीं फिर कोई होगी।।
ऑक्सीजन का है ये खजाना,
रोज हमें इक पौधा लगाना।
पर्यावरण दिवस को हम आज,
मिलकर आओं करें साकार।।
पृथ्वी को दें हरियाली का संसार,
फिर वो भी तो देगी हमको प्यार।
प्रदूषण को भी ये है दूर करें,
धरा पर शुद्ध वायु का हो संचार।।
खतरे में है धरा हमारी,
खतरे में है सारा संसार,
कुछ ना माँगे वो मानव तुझसे,
माँगे तो बस थोड़ा सा दुलार।।
प्राकृतिक नियमों का कर उल्लंघन,
तू क्यूँ बन बैठा है दानव?
अभी भी है तेरे पास वक्त बहुत,
दानव से बन जा तू फिर मानव।।
सुन ले पुकार प्रकृति की,
वरना फिर इक दिन पछतायेगा।
प्रकृति की तरफ यही रहा दृष्टिकोण,
वो पछतावे का दिन जल्दी आयेगा।।
पर्वत, नदी, झरने कितने अच्छे लगते?
प्रकृति के इसी में प्राण हैं बसते।
पर्यावरण पर है संकट छाया,
काल बनकर मानव इसपे मंडराया।।
जानबूझकर बन बैठा है अंजान,
खतरे में डाल रहा खुद के ही प्राण।
अपने लालच और स्वार्थ की खातिर,
ठुकरा रहा प्रकृति माँ के वरदान।।
मत बन मानव अब तू नादान,
दे पृथ्वी को वृक्षारोपण का वरदान।
फिर से मुस्कुराने दे धरा को,
ऐसे कर तू अच्छे-अच्छे काम।।
ए०सी० की हवा को कह दो ना,
स्वच्छ वायु को कह दो हाँ-हाँ।
प्लास्टिक को भी कर दे बाय,
जिससे फिर से धरा मुस्काये।।
रचयिता
ब्रजेश सिंह,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय बीठना,
विकास खण्ड-लोधा,
जनपद-अलीगढ़।

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