द्वन्द

एक अजीब सी कशमकश में खुद को पाती हूँ,
अपनी उधेड़बुन में खुद ही फँस सी जाती हूँ।

समाज ने बनाई जो ये लिंगभेद की खाई है,
नन्हें से बालमन को कहाँ समझ आई है।

क्यों घर की हर चीज पर पहला हकदार भाई है,
बच्चियों ने यह कहकर असहमति जताई है।

पग धरा है हमने ऊँचाइयों पर, हम ही सच्चे अधिकारी हैं,
लाख दमन सहकर भी हम बेटों पर भारी हैं।

नन्हा बालक भी निरपराध ही अपराधी सा बन जाता है,
इस समाज के भेदभाव में खुद को फँसा सा पाता है।

ना दीदी से ज्यादा न बहना से कम हूँ कहता है,
न्याय की आस में एकटक मुझको ताकता रहता है।

किसे बताऊँ कौन अधिक है किसे कहूँ कि कौन है कम?
अपनी कहते उसकी सुनते बहस जरा जब जाती थम।

बेटा-बेटी है समान और दोनों सुंदर मोती हैं,
एकदूजे को कम आँकने की आपस मे होड़ क्यों होती है।

कह तो देती हूँ मैं पर इतना बतलाती हूँ,
बेटा-बेटी दोनों को संतुष्ट नहीं मैं पाती हूँ।

भेद मिटेगा जब समाज का तब समझ वो पाएँगे,
अपने मन से लिंगभेद का दानव दूर भगाएँगे।

रचयिता
पूनम दानू पुंडीर,
सहायक अध्यापक,
रा०प्रा०वि० गुडम स्टेट,
संकुल- तलवाड़ी,
विकास खण्ड-थराली,
जनपद-चमोली, 
उत्तराखण्ड।

Comments

Post a Comment

Total Pageviews