दहेज

कैसे मान लूँ, दुनिया के उन लोगों को इंसान मैं?
जो बेटियों को परखते हैं, दहेज़ के इम्तहान में।

अपनी मजबूरी पे, वह दिल ही दिल रो रहा था,
सुंदर, हुनरमंद बेटी पैदा की थी, जिस इंसान ने।

नक़ली ज़ेवर पहना, बेटी को विदा करना पड़ा,
जिसका बाप कारीगर था, सोने की दुकान में।

दहेज के लोभी, उल्टा मुझको ही समझाने लगे,
बिना दहेज़ शादी की तो, कमी आएगी शान में,

खूब ख़ातिरदारी हो, कम्पनी का सामान मिले,
नक़दी भी मिले, कमी न रहे किसी इंतज़ाम में।

वक़्त की नज़ाकत, समझिए और होश में रहिए,
लगता है मास्टर जी आ गये हों, ऊँची उड़ान में।

शपथ लेता हूँ, मैं हमेशा दहेज़ का विरोधी रहूँगा,
शिक्षा दे बच्चों को बनाऊँगा, क़ाबिल इंसान मैं।

रचयिता
प्रदीप कुमार,
सहायक अध्यापक,
जूनियर हाईस्कूल बलिया-बहापुर,
विकास खण्ड-ठाकुरद्वारा,
जनपद-मुरादाबाद।

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