श्रावणी फुआर
हरी-हरी चूड़ी, मेंहदी है खास।
चल मेरी बहना, बगिया के पास।।
महुआ की डाल री, पड़ा है झूला।
देखत ही मन, मेरा री डोला।।
अब आजा तू देरी न कर।।
मन अपने तू सपनों को भर।।
बिंदिया है हरी, हरी है घास।।
हरी - हरी चूड़ी, मेंहदी---------1
आज मिलीं सब,दिनों में बहना।
अब न कोई बहाना है सहना।।
बतियाएँ सब झूलें साथी।
चिन्ता नहिं चाहे आए पाती।।
साड़ी हरी आज पहनूँ खास।
हरी - हरी चूड़ी, मेंहदी---------2
बहुत दिनों की जमां बात निराली।
करनी आज सब स्मृति खाली।।
फिर सुख-दु:ख की समीक्षा करनी।
पिया है सहयोगी या बे-दर्दी।।
टीका पहन और आजा पास।
हरी - हरी चूड़ी, मेंहदी---------3
सासुल माँ से मिला छुटकारा।
अब तो दिन और रात हमारा।।
गाएँ गीत, मल्हार सब मंगल सारी।
घर-मुहल्ले का बढ़ जाए पारा भारी।।
तू आज लगा ले नाँखूनी खास।
हरी - हरी चूड़ी, मेंहदी है खास।।
चल मेरी बहना, बगिया के पास।
रचयिता
नरेन्द्र सैंगर,
सह समन्वयक,
विकास खण्ड-धनीपुर,
जनपद-अलीगढ़।
चल मेरी बहना, बगिया के पास।।
महुआ की डाल री, पड़ा है झूला।
देखत ही मन, मेरा री डोला।।
अब आजा तू देरी न कर।।
मन अपने तू सपनों को भर।।
बिंदिया है हरी, हरी है घास।।
हरी - हरी चूड़ी, मेंहदी---------1
आज मिलीं सब,दिनों में बहना।
अब न कोई बहाना है सहना।।
बतियाएँ सब झूलें साथी।
चिन्ता नहिं चाहे आए पाती।।
साड़ी हरी आज पहनूँ खास।
हरी - हरी चूड़ी, मेंहदी---------2
बहुत दिनों की जमां बात निराली।
करनी आज सब स्मृति खाली।।
फिर सुख-दु:ख की समीक्षा करनी।
पिया है सहयोगी या बे-दर्दी।।
टीका पहन और आजा पास।
हरी - हरी चूड़ी, मेंहदी---------3
सासुल माँ से मिला छुटकारा।
अब तो दिन और रात हमारा।।
गाएँ गीत, मल्हार सब मंगल सारी।
घर-मुहल्ले का बढ़ जाए पारा भारी।।
तू आज लगा ले नाँखूनी खास।
हरी - हरी चूड़ी, मेंहदी है खास।।
चल मेरी बहना, बगिया के पास।
रचयिता
नरेन्द्र सैंगर,
सह समन्वयक,
विकास खण्ड-धनीपुर,
जनपद-अलीगढ़।

Nice poem
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