सूखा
एक सूखे तरु की काया
थी जर्जर उसकी छाया।
डाला चिड़ियों ने बसेरा
तरु का मानो....हुआ सवेरा
सबने उसे खाद.......दिया
स्नेह सुधा से सिंचित किया
कोपलें फूटी हरियाई डाली
फूल खिले, झूम उठे माली।
जश्न मना तरु की छाँव तले
हर्षित तन मन चिड़ियों के
पर हवा चली कुछ ऐसी
जाने-न-जाने कैसी..........
इक चिड़िया बोली मेरा तरु है
मैने ही पुष्प खिलाया है।
हक मेरा ही दूर गगन तक जाने का
इसकी खुश्बू फैलाने का।।
प्रिय, मुक्त गगन ने तुम्हें बुलाया
हाले तरु जानने को उकताया
तरु का हाल बताना तुम.....
है पुष्प खिले, है फली डाली
धरा-गगन तक ये फैलाना तुम
है क्षमता तुमने अपार.........
गगन चूम कर आना तुम।
तरु पर फूल खिले, है जश्न मना
क्या औरो को, घर....में भी,
कहने का अधिकार नहीं?
इतना हमको समझाना तुम।
इक सूखा वो भी छाया था....
जिसने तरु को कुम्भलाया था
इक सूखा ये भी आया है .....
जिसने मन को कुम्भलाया है
हक किसी का कोई न छीन सके
ईश्वर की अद्भुत माया है ......।
रचयिता
सरोज भारती,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय विशेश्वरगंज,
नगर क्षेत्र,
जनपद-गाजीपुर।
थी जर्जर उसकी छाया।
डाला चिड़ियों ने बसेरा
तरु का मानो....हुआ सवेरा
सबने उसे खाद.......दिया
स्नेह सुधा से सिंचित किया
कोपलें फूटी हरियाई डाली
फूल खिले, झूम उठे माली।
जश्न मना तरु की छाँव तले
हर्षित तन मन चिड़ियों के
पर हवा चली कुछ ऐसी
जाने-न-जाने कैसी..........
इक चिड़िया बोली मेरा तरु है
मैने ही पुष्प खिलाया है।
हक मेरा ही दूर गगन तक जाने का
इसकी खुश्बू फैलाने का।।
प्रिय, मुक्त गगन ने तुम्हें बुलाया
हाले तरु जानने को उकताया
तरु का हाल बताना तुम.....
है पुष्प खिले, है फली डाली
धरा-गगन तक ये फैलाना तुम
है क्षमता तुमने अपार.........
गगन चूम कर आना तुम।
तरु पर फूल खिले, है जश्न मना
क्या औरो को, घर....में भी,
कहने का अधिकार नहीं?
इतना हमको समझाना तुम।
इक सूखा वो भी छाया था....
जिसने तरु को कुम्भलाया था
इक सूखा ये भी आया है .....
जिसने मन को कुम्भलाया है
हक किसी का कोई न छीन सके
ईश्वर की अद्भुत माया है ......।
रचयिता
सरोज भारती,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय विशेश्वरगंज,
नगर क्षेत्र,
जनपद-गाजीपुर।

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