प्राथमिक शिक्षा परिदृश्य: कुछ उभरते सवाल
70 बरस.........। हाँ, देश को गणतंत्र घोषित हुए 70 बरस होने को हैं। सन् 1950 की 26 जनवरी को जब तिरंगा फहराया गया तो देश के करोड़ों लोगों की आँखों में एक सपना और मन में एक विश्वास जगा कि नई पीढ़ी को अब शिक्षा और विकास के समान अवसर मिलेंगे। लेकिन इतने वर्ष बीतने के बाद भी वह सपना साकार होकर धरातल पर न उतर सका। आज जहाँ विद्यालयों में पर्याप्त कक्षा-कक्षों का अभाव है वहीं बच्चों के बैठने के लिये फर्नीचर तो दूर टाट-फट्टी भी नसीब नहीं है। सरकार द्वारा लिया गया 6-14 वय वर्ग के बच्चों के लिये शिक्षा व्यवस्था का संकल्प अधूरा ही रहा। गणतंत्र के 70 बरस कम नहीं होते। आखिर क्यों, हर वर्ष लाखों बच्चों के कोमल हाथ कलम छोड़कर पकड़ लेते हैं हल की मूँठ और रिक्शा का हैण्डल, पीठ में बस्ते की जगह ले लेती है कचरा से दो जून की रोटी तलाशती बोरी, सिर मे होता है मनरेगा का तसला और तसले मे होते हैं नष्ट होते सपने।
पर्याप्त बजट के अभाव में अधिकांश विद्यालयों की दीवारों पर लगी काई, बरसात में छतों से टपकता पानी, टूटे खिड़की दरवाजे, परिसर में जल भराव, उगी झाड़-झंखाड़ और कीचड़ में से होकर पहुँचते बच्चों का दृश्य स्कूल की छवि धूमिल करते हैं। 70 वर्षों के बाद भी विद्यालयों की स्थिति इतनी दीन-हीन, अनाकर्षक एवं जर्जर क्यों है? विद्यालय बच्चों के आकर्षण एवं जीवन गढ़ने के केन्द्र नहीं बल्कि कैदखाना क्यों बनते जा रहे हैं? सरकारी प्राथमिक विद्यालयों से पढ़कर निकले बच्चे डाक्टर, वकील, शिक्षक, वैज्ञानिक, न्यायाधीश और प्रशासनिक अधिकारी ही नहीं बने हैं वरन देश के शीर्ष राजनीतिक पदों को भी सुशोभित किया है। विचार करना होगा कि आखिर ये विद्यालय आज इतने लाचार, बेबस और बेहाल क्यों हैं? बच्चों के बैठने के लिए पर्याप्त बिछावन और बेंच नहीं हैं। शौचालय ध्वस्त पड़े हैं, स्वच्छ पेयजल का अभाव है। कहने को तो स्कूलों में वायरिंग कर बिजली मुहैया करा दी गयी है लेकिन गाँव-मजरों में न खम्भे-तार हैं न बिजली। यह अव्यवस्था न केवल नौनिहालों का सुनहरा कल नष्ट कर रही है बल्कि भारत कीे प्रतिभा को भी लील रही है और हम हैं कि सोये अलसाये पडे़ हैं। दोषी कौन है? यह व्यवस्था? शिक्षक या समाज? अध्यापकों को समझना होगा कि छत, दीवार, अध्यापक और संसाधनों से विद्यालय नही बनता। बच्चे ही विद्यालय हैं। बच्चे नहीं तो विद्यालय नहीं। आज विद्यालय डर का पर्याय बन गये हैं। पाठ्यक्रम और पुस्तकें बढ़ी हैं लेकिन बच्चे का ज्ञान और कौशल नही बढ़ा और न ही विद्यालय के प्रति रुचि एवं आत्मीयता बढ़ी। आज शिक्षक पाठ्यक्रम की पुस्तकें पढ़ाते हैं बच्चों को नहीं। यदि बच्चों को पढ़ाया होता तो दोनों के बीच भय की खाई न बनी होती बल्कि आपसी समझ आत्मीयता और मधुरता का मनोहर सेतु उभरता जिससे होकर बच्चा समाज-जीवन के किसी भी क्षेत्र में अपनी सार्थक भूमिका निर्वहन करने में समर्थ होता। शिक्षकों को बच्चों के मन को पढ़ना होगा। उनके हृदय में गहरे उतरना होगा। उनकी प्रकृति एवं स्वभाव को समझना होगा। बच्चे को मिली डाँट-फटकार उसे विद्रोही, बागी और कुन्ठित बना देती है या हीन भावना से ग्रस्त एक मनोरोगी। एक बार एक सज्जन गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर से भेंट करने शान्ति निकेतन गये। उन्होंने एक वृ़क्ष के नीचे गुरुदेव को चिन्तामग्न बैठे और लगभग 15-20 बच्चों को खेलते, पेड़ पर चढ़ते और कूदते देखा। एक बच्चा पेड़ के नीचे चुपचाप बैठा था। उस सज्जन ने जाते ही गुरुदेव से कहा कि निश्चित रूप से आप पेड़ पर चढे़ बच्चों से परेशान चिन्तित हैं। गुरुदेव ने उत्तर दिया कि मैं पेड़ पर चढ़े बच्चों से नहीं बल्कि पेड़ के नीचे बैठे बच्चे को लेकर चिन्तित हूँ क्योंकि पेड़ पर चढ़ना, उछलकूद करना बच्चों की स्वाभाविक प्रकृति है। आज कितने शिक्षक बच्चों की प्रकृति और मनोभावों को समझने की कोशिश करते हैं। आवश्यकता है कि बच्चों को संवेदनशील और गतिशील बनाया जाये। उनके अन्दर साहस, शील, शौर्य, निर्भयता, सह-अस्तित्व, प्रेम, करुणा आदि मानवीय सद्प्रवृत्तियों को जाग्रत किया जाए। शारीरिक व मानसिक यातनायें देकर उन्हे कुण्ठित, दब्बू और हीन न बनाया जाए। आज विद्यालय प्रारम्भ होने की घण्टी बच्चों को डराती क्यों है? छुट्टी की घण्टी बच्चों के चेहरे में खुशी ला देती हैं, क्यों? क्या स्कूल जेल या कसाईबाड़ा बनते जा रहे हैं? जहाँ दाखिल हुआ बच्चा छः घण्टों के लिये कैदी है, बन्धक है। जहाँ प्रेरणा, हास्य, उल्लास, उमंग, उत्साह, प्यार, दुलार, ममता, समता कल्पना एवं सृजन का संसार नही बल्कि घुटन, रुदन, पीडा, नैराश्य, कलुषता, और विषमता का राज है। उसकी मासूमियत, जिज्ञासा, इन्द्रधनुषी कल्पनाओं और संवेदनाओं की रोज हत्या की जाती है। इन छः घण्टों में वह कितनी बार मरता और जीता है।
आज के परिप्रेक्ष्य में शिक्षकों से संदर्भित भूदान आन्दोलन के सूत्रधार विनोबा भावे का कथन सोचने को मजबूर करता है कि ‘किसी भी देश का आने वाला कल इसी बात पर निर्भर करता है कि उस कल को दिशा देने वाले कौन हैं।’ देश के कल को दिशा देने वाले मौन क्यों हैं? शिक्षकों-अभिभावकों और प्रबन्ध समितियों को यह चुनौती स्वीकार करनी होगी। उन्हें भारत के कल को सुखी, समृद्ध एवं समुन्नत करने के लिये कटिबद्ध होना होगा। यदि हम देश की प्राथमिक शिक्षा के गिरते स्तर के परिदृश्य को सुधारना चाहते हैं तो कुछ बुनियादी बातों पर अमल करना होगा। अभिभावकों, शिक्षकों और नागरिकों को समझना होगा कि विद्यालय केवल सरकारी भवन नहीं है। वह समाज की सम्पत्ति और संस्कारशाला है। वह एक सामुदायिक केन्द्र है। प्रत्येक विद्यालय की प्रबन्धन समिति को सक्रिय और गतिशील करना होगा। समिति की नियमित बैठकें हों। समिति विद्यालय और शिक्षकों के लिये मित्रभाव से कार्य करे। उनके सुख-दुःख में सहभागी हो। विद्यालय का वातावरण आकर्षक व रूचिपूर्ण बनाने में सहयोग, सहकार एवं सामंजस्य का भाव दिखायें। शिक्षक की कमी होने पर गाँव के योग्य युवा समय देकर एक आदर्श परम्परा विकसित कर सकते हैं। हालांकि कुछ शिक्षकों और समितियों ने रुचि लेकर अपने विद्यालयों को बेहतर किया है। कुछ राज्य सरकारें भी स्कूल बेहतरी की दिशा में काम कर रही हैं। विश्वास मानिये एक गाँव में एक दीप जलेगा तो दूसरे गाँव उसके प्रकाश में पथ खोज लेगें। दीप से दीप जलते जायेेगें और शिक्षा के प्रकाश से सारा देश नहा उठेगा। ग्राम-गिरिवासी-वनवासी हर बालक-बालिका के मुखमण्डल में तेज, ओज एवं ज्ञान की आभा बिखरी होगी और हृदयों में देश एवं समाज के लिये सर्वस्व समर्पण का अदम्य उत्साह और उदात्त मंगल भावना भी।
लेखक पर्यावरण, महिला, लोक संस्कृति, इतिहास एवं शिक्षा के मुद्दों पर दो दशक से शोध एवं काम कर रहे हैं।
बाल केन्द्रित शिक्षा के नाम पर सेमिनार होते रहे, योजनाएँ बनती रहीं। पर बस्ते का बोझ बढ़ता रहा और उस बोझ के नीचे बच्चे दबते गये, पिसते गये। निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 को लागू कर सरकारें खुद ही पीठ थपथपा रही है। लेकिन आज भी सुदूरवर्ती क्षेत्रों में हजारों ‘गोबर’, ‘होरी’ और ‘धनिया’ की अँगुली पकड़े विद्यालय की बाट जोह रहे हैं। बच्चों को शिक्षा का अधिकार तो मिला लेकिन विद्यालयों, शिक्षकोें, कक्षा-कक्षों और संसाधनों के अभाव में बच्चों केे लिये दिल्ली अभी बहुत दूर की बात है।
पर्याप्त बजट के अभाव में अधिकांश विद्यालयों की दीवारों पर लगी काई, बरसात में छतों से टपकता पानी, टूटे खिड़की दरवाजे, परिसर में जल भराव, उगी झाड़-झंखाड़ और कीचड़ में से होकर पहुँचते बच्चों का दृश्य स्कूल की छवि धूमिल करते हैं। 70 वर्षों के बाद भी विद्यालयों की स्थिति इतनी दीन-हीन, अनाकर्षक एवं जर्जर क्यों है? विद्यालय बच्चों के आकर्षण एवं जीवन गढ़ने के केन्द्र नहीं बल्कि कैदखाना क्यों बनते जा रहे हैं? सरकारी प्राथमिक विद्यालयों से पढ़कर निकले बच्चे डाक्टर, वकील, शिक्षक, वैज्ञानिक, न्यायाधीश और प्रशासनिक अधिकारी ही नहीं बने हैं वरन देश के शीर्ष राजनीतिक पदों को भी सुशोभित किया है। विचार करना होगा कि आखिर ये विद्यालय आज इतने लाचार, बेबस और बेहाल क्यों हैं? बच्चों के बैठने के लिए पर्याप्त बिछावन और बेंच नहीं हैं। शौचालय ध्वस्त पड़े हैं, स्वच्छ पेयजल का अभाव है। कहने को तो स्कूलों में वायरिंग कर बिजली मुहैया करा दी गयी है लेकिन गाँव-मजरों में न खम्भे-तार हैं न बिजली। यह अव्यवस्था न केवल नौनिहालों का सुनहरा कल नष्ट कर रही है बल्कि भारत कीे प्रतिभा को भी लील रही है और हम हैं कि सोये अलसाये पडे़ हैं। दोषी कौन है? यह व्यवस्था? शिक्षक या समाज? अध्यापकों को समझना होगा कि छत, दीवार, अध्यापक और संसाधनों से विद्यालय नही बनता। बच्चे ही विद्यालय हैं। बच्चे नहीं तो विद्यालय नहीं। आज विद्यालय डर का पर्याय बन गये हैं। पाठ्यक्रम और पुस्तकें बढ़ी हैं लेकिन बच्चे का ज्ञान और कौशल नही बढ़ा और न ही विद्यालय के प्रति रुचि एवं आत्मीयता बढ़ी। आज शिक्षक पाठ्यक्रम की पुस्तकें पढ़ाते हैं बच्चों को नहीं। यदि बच्चों को पढ़ाया होता तो दोनों के बीच भय की खाई न बनी होती बल्कि आपसी समझ आत्मीयता और मधुरता का मनोहर सेतु उभरता जिससे होकर बच्चा समाज-जीवन के किसी भी क्षेत्र में अपनी सार्थक भूमिका निर्वहन करने में समर्थ होता। शिक्षकों को बच्चों के मन को पढ़ना होगा। उनके हृदय में गहरे उतरना होगा। उनकी प्रकृति एवं स्वभाव को समझना होगा। बच्चे को मिली डाँट-फटकार उसे विद्रोही, बागी और कुन्ठित बना देती है या हीन भावना से ग्रस्त एक मनोरोगी। एक बार एक सज्जन गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर से भेंट करने शान्ति निकेतन गये। उन्होंने एक वृ़क्ष के नीचे गुरुदेव को चिन्तामग्न बैठे और लगभग 15-20 बच्चों को खेलते, पेड़ पर चढ़ते और कूदते देखा। एक बच्चा पेड़ के नीचे चुपचाप बैठा था। उस सज्जन ने जाते ही गुरुदेव से कहा कि निश्चित रूप से आप पेड़ पर चढे़ बच्चों से परेशान चिन्तित हैं। गुरुदेव ने उत्तर दिया कि मैं पेड़ पर चढ़े बच्चों से नहीं बल्कि पेड़ के नीचे बैठे बच्चे को लेकर चिन्तित हूँ क्योंकि पेड़ पर चढ़ना, उछलकूद करना बच्चों की स्वाभाविक प्रकृति है। आज कितने शिक्षक बच्चों की प्रकृति और मनोभावों को समझने की कोशिश करते हैं। आवश्यकता है कि बच्चों को संवेदनशील और गतिशील बनाया जाये। उनके अन्दर साहस, शील, शौर्य, निर्भयता, सह-अस्तित्व, प्रेम, करुणा आदि मानवीय सद्प्रवृत्तियों को जाग्रत किया जाए। शारीरिक व मानसिक यातनायें देकर उन्हे कुण्ठित, दब्बू और हीन न बनाया जाए। आज विद्यालय प्रारम्भ होने की घण्टी बच्चों को डराती क्यों है? छुट्टी की घण्टी बच्चों के चेहरे में खुशी ला देती हैं, क्यों? क्या स्कूल जेल या कसाईबाड़ा बनते जा रहे हैं? जहाँ दाखिल हुआ बच्चा छः घण्टों के लिये कैदी है, बन्धक है। जहाँ प्रेरणा, हास्य, उल्लास, उमंग, उत्साह, प्यार, दुलार, ममता, समता कल्पना एवं सृजन का संसार नही बल्कि घुटन, रुदन, पीडा, नैराश्य, कलुषता, और विषमता का राज है। उसकी मासूमियत, जिज्ञासा, इन्द्रधनुषी कल्पनाओं और संवेदनाओं की रोज हत्या की जाती है। इन छः घण्टों में वह कितनी बार मरता और जीता है।
आज के परिप्रेक्ष्य में शिक्षकों से संदर्भित भूदान आन्दोलन के सूत्रधार विनोबा भावे का कथन सोचने को मजबूर करता है कि ‘किसी भी देश का आने वाला कल इसी बात पर निर्भर करता है कि उस कल को दिशा देने वाले कौन हैं।’ देश के कल को दिशा देने वाले मौन क्यों हैं? शिक्षकों-अभिभावकों और प्रबन्ध समितियों को यह चुनौती स्वीकार करनी होगी। उन्हें भारत के कल को सुखी, समृद्ध एवं समुन्नत करने के लिये कटिबद्ध होना होगा। यदि हम देश की प्राथमिक शिक्षा के गिरते स्तर के परिदृश्य को सुधारना चाहते हैं तो कुछ बुनियादी बातों पर अमल करना होगा। अभिभावकों, शिक्षकों और नागरिकों को समझना होगा कि विद्यालय केवल सरकारी भवन नहीं है। वह समाज की सम्पत्ति और संस्कारशाला है। वह एक सामुदायिक केन्द्र है। प्रत्येक विद्यालय की प्रबन्धन समिति को सक्रिय और गतिशील करना होगा। समिति की नियमित बैठकें हों। समिति विद्यालय और शिक्षकों के लिये मित्रभाव से कार्य करे। उनके सुख-दुःख में सहभागी हो। विद्यालय का वातावरण आकर्षक व रूचिपूर्ण बनाने में सहयोग, सहकार एवं सामंजस्य का भाव दिखायें। शिक्षक की कमी होने पर गाँव के योग्य युवा समय देकर एक आदर्श परम्परा विकसित कर सकते हैं। हालांकि कुछ शिक्षकों और समितियों ने रुचि लेकर अपने विद्यालयों को बेहतर किया है। कुछ राज्य सरकारें भी स्कूल बेहतरी की दिशा में काम कर रही हैं। विश्वास मानिये एक गाँव में एक दीप जलेगा तो दूसरे गाँव उसके प्रकाश में पथ खोज लेगें। दीप से दीप जलते जायेेगें और शिक्षा के प्रकाश से सारा देश नहा उठेगा। ग्राम-गिरिवासी-वनवासी हर बालक-बालिका के मुखमण्डल में तेज, ओज एवं ज्ञान की आभा बिखरी होगी और हृदयों में देश एवं समाज के लिये सर्वस्व समर्पण का अदम्य उत्साह और उदात्त मंगल भावना भी।
लेखक पर्यावरण, महिला, लोक संस्कृति, इतिहास एवं शिक्षा के मुद्दों पर दो दशक से शोध एवं काम कर रहे हैं।
सम्प्रति:-
ब्लाॅक संसाधन केन्द्र नरैनी, बांदा में सह-समन्वयक (हिन्दी) पद पर
कार्यरत। प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में गुणात्मक बदलावों, आनन्ददायी
षिक्षण एवं नवाचारी मुद्दों पर सतत् लेखन एवं प्रयोग ।
सम्पर्क:- 79/18, शास्त्री नगर, अतर्रा - 210201, जिला - बाँदा, उ. प्र.। मोबा. - 9452085234,
लेखक
प्रमोद दीक्षित ʺमलयʺ
सह-समन्वयक - हिन्दी,
बीआरसी नरैनी , जिला - बांदा
79 ⁄ 18‚ शास्त्री नगर‚
अतर्रा – 210201‚ जिला– बाँदा‚ उत्तर प्रदेश
Mob. 09452085234
बीआरसी नरैनी , जिला - बांदा
79 ⁄ 18‚ शास्त्री नगर‚
अतर्रा – 210201‚ जिला– बाँदा‚ उत्तर प्रदेश
Mob. 09452085234

हार्दिक आभार आदरणीय
ReplyDeletenice
ReplyDelete