नवांकुर
अपनी माँ की कोख में पल रही कन्या भ्रूण, अपनी माँ से लगाती गुहार
धरा हो उस बगिया की माँ तू,
जिस बगिया की मैं अंकुर हूँ।
मैं उत्सुक हूँ, विकसित हो,
उस बगिया में आने को।
हरित पल्लवित पुष्पलता बन,
तेरी बगिया महकाने को।
पर मुझको भय सता रहा है,
कुरीति परस्ती जता रहा है।
लौहयन्त्र वार से मुझे कुन्दकर,
माँ कोख धरा से अलग-थलग कर,
कचरे में ना फेंकी जाऊँ।
ऐ मेरी ममतामयी माँ,
तू ऐसा होने से रोक।
तू टोक उसे,
जो करने को रहा हो ऐसा सोच।
ताकी मैं भी उस दुनिया में आ पाऊँ,
नवांकुर से हरित लता बन,
तेरी बगिया में छा जाऊँ।।
मैं वादा करती हूँ तुमसे माँ,
साहस खुद में भरती हूँ माँ।
नहीं बनूँगी बोझ किसी पर,
करूँगी सेवा मैं जीवन भर।
मैं तन-मन से मेहनत करके,
सूखा, धूप, छाँव सह करके,
चोटी पर लहराऊँगी।
तेरी बगिया का गौरव बन,
जग में नाम कमाउँगी।।
पहले धरती पर आने दो,
तब करके इसे दिखाउँगी।
जय हिंद
जय भारत की कन्या
रचयिता
विजय मेहंदी,
सहायक अध्यापक,
KPS(E.M.School)Shudanipur,Madiyahu,
जनपद-जौनपुर।
धरा हो उस बगिया की माँ तू,
जिस बगिया की मैं अंकुर हूँ।
मैं उत्सुक हूँ, विकसित हो,
उस बगिया में आने को।
हरित पल्लवित पुष्पलता बन,
तेरी बगिया महकाने को।
पर मुझको भय सता रहा है,
कुरीति परस्ती जता रहा है।
लौहयन्त्र वार से मुझे कुन्दकर,
माँ कोख धरा से अलग-थलग कर,
कचरे में ना फेंकी जाऊँ।
ऐ मेरी ममतामयी माँ,
तू ऐसा होने से रोक।
तू टोक उसे,
जो करने को रहा हो ऐसा सोच।
ताकी मैं भी उस दुनिया में आ पाऊँ,
नवांकुर से हरित लता बन,
तेरी बगिया में छा जाऊँ।।
मैं वादा करती हूँ तुमसे माँ,
साहस खुद में भरती हूँ माँ।
नहीं बनूँगी बोझ किसी पर,
करूँगी सेवा मैं जीवन भर।
मैं तन-मन से मेहनत करके,
सूखा, धूप, छाँव सह करके,
चोटी पर लहराऊँगी।
तेरी बगिया का गौरव बन,
जग में नाम कमाउँगी।।
पहले धरती पर आने दो,
तब करके इसे दिखाउँगी।
जय हिंद
जय भारत की कन्या
रचयिता
विजय मेहंदी,
सहायक अध्यापक,
KPS(E.M.School)Shudanipur,Madiyahu,
जनपद-जौनपुर।

Bahut sundar
ReplyDeleteKeep going
Wish you all the best
Thank you Sir ji
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