नहीं स्वीकृत! मुझको यह हार

जब लगे कि तुम निराश होने लगे हो
अपनी ज़िन्दगी में बढ़ती ज़िम्मेदारियों से
जब लगे कि तुम हताश होने लगे हो
अपनी डगर में बढ़ती दुश्वारियों से

अपनों की बढ़ती दूरियों के बोझ से
जब तुम्हारी साँसे भारी होने लगे
सागर सी विशाल अनुभवी लहर से
जब सारी मिठास खारी होने लगे

और जब लगे की कोई ऐसा नही
जो बढ़कर हाल तुम्हारा पूछ ले
या जब लगे की कोई भी ऐसा नहीं
जो तुम्हारा बुझा अंर्तमन बूझ ले

तुम हँसो और मन में कुछ और चले
मैं ठीक हूँ कहो, मन कुछ और कहे
जब पलकों के पीछे कैद सागर जले
जब मायूस मन में वीरान सदाएँ बहें

उस वक़्त!
अपने सामर्थ्य की मुठ्ठी कसकर
अपने अंतर्मन पर करना प्रहार
कहना उससे ! हे अंतर्मन!
नही स्वीकृत ! मुझको यह हार!!
नहीं स्वीकृत ! मुझको यह हार!!

रचयिता
यशोदेव रॉय,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय नाउरदेउर,
विकास खण्ड-कौड़ीराम, 
जनपद-गोरखपुर।


Comments

  1. अंतर्द्वन्द्व-जनित अनुभूतियों को प्रतिबिंबित करती

    अंतर्मन को संबल प्रदान करती

    कविता शब्द को सार्थक करती

    रचना हेतु यशोदेव जी को हृदय से नमन
    ��
    (प्रशान्त अग्रवाल, बरेली)

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