प्रकृति की ओर
यहाँ–वहाँ, जहाँ–तहाँ
इधर–उधर, यहीं कहीं
पड़ी रही, सड़ी नहीं ।
जी हाँ, ये है पॉलीथीन ॥
मानव की ये निर्मिति ।
बन गयी है, अब विपत्ति ॥
करे सकल, जग विकल ।
आये रूप बदल–बदल ॥
निकल न पाये कोई हल ।
करे सभी प्रयास विफल ॥
भूमि में पड़ी रहे, नष्ट कर दे उर्वरा
बनी हुई है, अपराजिता,
दूषित करे गगन–धरा॥
मानव की ये रचना ।
दिखा रही है आईना ॥
आओ कहें इसको 'ना' ।
आओ कहें इसको 'ना' ॥
सब करें दृढ संकल्प ।
रचें कोई नया विकल्प ॥
चलें प्रकृति की ओर ।
आओ चलें प्रकृति की ओर ।।
रचयिता
सीमा पाण्डेय,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय बरहुआं,
विकास खण्ड-पिपरौली,
जनपद-गोरखपुर।
इधर–उधर, यहीं कहीं
पड़ी रही, सड़ी नहीं ।
जी हाँ, ये है पॉलीथीन ॥
मानव की ये निर्मिति ।
बन गयी है, अब विपत्ति ॥
करे सकल, जग विकल ।
आये रूप बदल–बदल ॥
निकल न पाये कोई हल ।
करे सभी प्रयास विफल ॥
भूमि में पड़ी रहे, नष्ट कर दे उर्वरा
बनी हुई है, अपराजिता,
दूषित करे गगन–धरा॥
मानव की ये रचना ।
दिखा रही है आईना ॥
आओ कहें इसको 'ना' ।
आओ कहें इसको 'ना' ॥
सब करें दृढ संकल्प ।
रचें कोई नया विकल्प ॥
चलें प्रकृति की ओर ।
आओ चलें प्रकृति की ओर ।।
रचयिता
सीमा पाण्डेय,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय बरहुआं,
विकास खण्ड-पिपरौली,
जनपद-गोरखपुर।

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