मौसम

सुखद सजीला हरीतिमा संग
मौसम ये प्यारा आया है।
संग बहारें लेकर के
मन प्रफुल्लित करने आया है।
पाके मनदम रस बूँदों भरी,
तन-मन उल्लासित नहाया है।
सुख गयी थी धरती माता
सुख गया था अन्तर्मन।
पड़ी जो बूँदे रिमझिम कर,
धरिनी पशु-पक्षी जनजीवन पर।
स्निग्ध भाव से आतुर नैना
तन मन औ जग जीवन जागा।
फैली हरियाली चहुँओर,
सर्वत्र दिखे सब हरे-भरे।
जीवन की सुखी डलिया पर
वर्षा ने खिलाये फूल नये।
हे नर नाहक न करो प्रचण्ड
रख धीर बनो तुम माँ के वत्सल।
प्रकृति पर करो न प्रहार कभी
जीवन जाएँगे हार सभी।
दादुर की टेर सुनने को
नृत्य मयूरा देखन को
बगिया झूलों से भरी रहे
मनमुग्ध मगन हो नाचन को।
न करना दोहन प्रकृति का कभी
ना दुःख देना माँ धरती को।
मौसम की बहारें बरसों बरस
आएगी जीवन देने को।
अविरल निश्छल अनन्त काल तक
ये साथ निभाएगी सुनो।।।।।।
   
रचयिता 
ममता प्रीति श्रीवास्तव,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय बेईली,
विकास खण्ड-बड़हलगंज,
जनपद-गोरखपुर।

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