हमारी प्रकृति

प्रकृति!  प्रकृति!
माँ क्या  यह होती?
मुझको भी तो तुम बताओ,
थोड़ा मुझे भी समझाओ।
 बेटी तुम तो हो  अभी
       बहुत ही छोटी।
पर..सुन लो जो भी..
 मैं बात बताती...
 ईश्वर की हर एक कृति,
जो दे हमें सुखद अनुभूति।
वही कहलाती है प्रकृति ।।
जल, अग्नि,    गगन ,
     समीर  और      धरती ।।
सब प्रकृति के अंग में आती                           
जंगल,  जीव -जंतु  ।
               और वनस्पति।।
की अब हो रही विलुप्ति
पानी, भूमि और क्षेत्र पर्वती।।         
सबकी        हो       रही
अंधाधुंध अब  घटौती ।।
इनको हमें करना है संरक्षित वरना प्रकृति भी है घबराती।।
कहीं बाढ, कहीं सूखा, कहीं भूकंप   
कहीं    ज्वालामुखी
सब के जीवन पर
           मौत  है   मंडराती।।
तो क्या माँ! मना के हम ,
   दिवस     या  जयंती
बचा लेंगे  क्या यह प्रकृति ?
बेटी के प्रश्नों से
मैं भी घबराती !!
होना होगा सभी ,                 
       को    सम्मिलित !
करना होगा हमें संरक्षित,
जब बन जाए सबकी सहमति
                 तो बच  पाएगी
         तुम्हारी      प्रकृति
मेरी प्रकृति, हमारी  प्रकृति
हम सब की प्यारी प्रकृति।।

रचयिता
प्रियंशा मौर्य,
प्राथमिक विद्यालय चिलार,
विकास क्षेत्र-देवकली,
जनपद-गाजीपुर।

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