गरीबी की जुबानी
अस्थिपंजर की एक छाया,
विदा ले रही जिंदगी से।
उसकी मुरझाई काया,
कहती कहानी जिन्दगी की।
कट गये दिन, ऊँगलियों पर,
कटी रातें, तारों को गिनकर।
कभी रोटी मिली, तो कभी,
तन छिपाया आँसुओं में।
सम्पन्नता की दुहाई देने वाले,
विपन्नता के धनी निकले।
हड्डियों से खींचा,
दुनिया के बोझ को।
अपनो को छोड़ बोझ सा,
वो कहाँ निकले।
अनदेखा किया उनके घरों को,
रौंदा सभी ने सिर के छतों को।
सड़कों पर जनम लिया,
सड़कों पर ही उनके प्राण निकले।
रचयिता
निधि लता सिंह,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय नईयापार खुर्द,
विकास क्षेत्र-पिपराइच,
जनपद-गोरखपुर।
विदा ले रही जिंदगी से।
उसकी मुरझाई काया,
कहती कहानी जिन्दगी की।
कट गये दिन, ऊँगलियों पर,
कटी रातें, तारों को गिनकर।
कभी रोटी मिली, तो कभी,
तन छिपाया आँसुओं में।
सम्पन्नता की दुहाई देने वाले,
विपन्नता के धनी निकले।
हड्डियों से खींचा,
दुनिया के बोझ को।
अपनो को छोड़ बोझ सा,
वो कहाँ निकले।
अनदेखा किया उनके घरों को,
रौंदा सभी ने सिर के छतों को।
सड़कों पर जनम लिया,
सड़कों पर ही उनके प्राण निकले।
रचयिता
निधि लता सिंह,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय नईयापार खुर्द,
विकास क्षेत्र-पिपराइच,
जनपद-गोरखपुर।

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