लाठी की पुकार

गांधी तेरी लाठी करती ये पुकार
हो रहा है कितना देखो अत्याचार
जात-धर्म से हो गए, सब यहाँ लाचार
ईमान का भी हो रहा खूब व्यापार
गांधी तेरी लाठी करती ये पुकार

लूट-पाट, दंगों की दुकानें चल रही
बहू-बेटियों की अस्मिता लुट रही
मंदिर-मस्ज़िद भी फल-फूल रही
इन सबसे भरा हुआ है अख़बार
गांधी तेरी लाठी करती ये पुकार

साम-दाम दंड भेद, गांधी नाम रहे
नैतिकता को अपने सब त्याग रहे
गांधी के वचन तो सबको याद रहे
मनाते इसे जैसे हो कोई त्यौहार
गांधी तेरी लाठी करती ये पुकार

करूणा अहिंसा तेरा रूप रहा
अंग्रेजों के सामने तू न डिगा
तेरे उसी रूप क़ी है दरकार
गांधी तेरी लाठी करती ये पुकार

रचयिता
आकिब जावेद,
सहायक अध्यापक,
अंग्रेजी माध्यम प्राइमरी स्कूल उमरेहण्डा,
विकास खण्ड-बिसंडा,
जिला-बाँदा,
उत्तर प्रदेश।

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