बुजुर्ग दिवस

बुजुर्ग हुए हैं संगीसाथी, बुजुर्ग हुए हालात।

बच्चों में हैं नई उमंगें नई-नई है चाल।

कभी चले जो हाथ पकड़कर वही दिखाते आँख।

बुजुर्ग हुए हों मम्मी पापा, बैठो अब चुपचाप।

हृदय है रोता, पर नहीं भूला मस्तिष्क पुरानी बात।

यही किया था हमने भी तो अपने बुजुर्गों के साथ।

कहते थे हम, तुम नहीं समझोगे टेलीफोनिक बात।

नया यंत्र है नया तंत्र और नवयुग का आगाज।

देखते थे वो टुकुर-टुकुर तो लगते थे बदहवास।

समय चक्र का पहिया घूमा, फोन हुआ मोबाइल।

वही हैं बातें, ताने वही हैं, बस बदल गए हैं साल।

काश समझते उस पल हम भी होंगे बुजुर्ग हम हर हाल।

समय चक्र से कोई न छूटा, चाहें खुश हो या हो रुठा।

इसका कहर हर एक पर टूटा, बिरला हो या हो वो बूटा।

सँभलो बच्चों बात को समझो, बुजुर्गों के हालात को समझो।

हर दिन उनको प्यार से रखो, एक दिवस का ही न मतलब रखो।

युग भी बदला हम भी बदले, बुजुर्गों के हालात न बदले।

इस बदहाली को अब न बढ़ाओ, इस चक्र को यहीं थमाओ।

अब सब मिलकर हाथ उठाओ, बुजुर्गों को सम्मान दिलाओ।

तब ही होगा साकार बुजुर्ग दिवस का सपना सलोना।


रचयिता 

पूनम सारस्वत,

सहायक अध्यापक,

एकीकृत विद्यालय रुपानगला,

विकास खण्ड-खैर, 

जनपद-अलीगढ़।



Comments

Total Pageviews