पहाड़ से पलायन
आज गाँवों पर पलायन का भूत सवार है
सुख चैन छोड़कर चार पैसे का इंतजार है
पुरखों की जमीन और मकान हो गए बंजर और जर्जर
फिर भी परदेश में खुश हैं किराए के मकान पर
छूट गए सखी साथी और रिश्तेदार
बस पूरा संसार हो गया केवल अपना परिवार
वो बचपन की यादें वो मस्त भरी किलकारियाँ
पलायन का भूत निगल गया सारे घर की खुशियाँ
मम्मी पापा दादा दादी की वो प्यारी डाँट लगाना
बात-बात पर हमको समझाना और बुझाना
त्योहारों में सबका यूँ इक्कठा होना
घर-घर जाकर सबका माखन और दही खाना।
आज सूने और विवश हैं बूढ़े गई गाँवों में
कब आएँगे वो दिन लौटकर सिर्फ सपने हैं आँखों में
हे ईश्वर लौटा दो हमें वो दिन और वो गलियारे
जो थे हमको कभी सबसे प्यारे सबसे प्यारे।।
रचयिता
लक्ष्मी नेगी,
रा0 प्रा0वि0 खुरड़,
विकास खण्ड-अगस्त्यमुनि,
जनपद-रूद्रप्रयाग,
उत्तराखण्ड।
सुख चैन छोड़कर चार पैसे का इंतजार है
पुरखों की जमीन और मकान हो गए बंजर और जर्जर
फिर भी परदेश में खुश हैं किराए के मकान पर
छूट गए सखी साथी और रिश्तेदार
बस पूरा संसार हो गया केवल अपना परिवार
वो बचपन की यादें वो मस्त भरी किलकारियाँ
पलायन का भूत निगल गया सारे घर की खुशियाँ
मम्मी पापा दादा दादी की वो प्यारी डाँट लगाना
बात-बात पर हमको समझाना और बुझाना
त्योहारों में सबका यूँ इक्कठा होना
घर-घर जाकर सबका माखन और दही खाना।
आज सूने और विवश हैं बूढ़े गई गाँवों में
कब आएँगे वो दिन लौटकर सिर्फ सपने हैं आँखों में
हे ईश्वर लौटा दो हमें वो दिन और वो गलियारे
जो थे हमको कभी सबसे प्यारे सबसे प्यारे।।
रचयिता
लक्ष्मी नेगी,
रा0 प्रा0वि0 खुरड़,
विकास खण्ड-अगस्त्यमुनि,
जनपद-रूद्रप्रयाग,
उत्तराखण्ड।

Comments
Post a Comment