प्रदूषण

कल-कल छल-छल पवित्र निर्मल बहता था गंगा जल।
     कल कारखानों से निकला कचरा मानव बहा रहा है मल।।

    नित आर्सेनिक स्वास्थ्य को खतरा बढ़ा रहा है।
      दूषित होते जल से हैजा पेचिस क्षय कहर ढा रहा है।।

    जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं।
   पर शुद्ध जल के लिये मानव तरस रहा है।।

पर्यावरण की रक्षा हेतु कदम बढ़ाना होगा।
    प्रदूषण को दूर भगाना होगा।।

जनसंख्या के बढ़ने से प्राकृतिक संसाधनों का नित दोहन हो रहा है।
 शहरीकरण की चाह में हो रही वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई।।

   श्वांस लेना मानव को मुश्किल हो चला है।
     बढ़ रहा तापमान ओजोन के क्षरण से।

    जीवन का आधार है प्राण वायु
धरती को हरा-भरा बनाना होगा।।

   पर्यावरण की रक्षा हेतु कदम बढ़ाना होगा।
     प्रदूषण को दूर भगाना होगा।।

  कारखानों से खट-पट की आवाजें।
औद्योगिक क्रांति का ढिंढोरा पीटने में लगे हैं।।

    ट्रेनों जहाजो की चिल पौ सह के।
यातायात के साधनों की मौज तो ले रहे।।

त्योहारों समारोहों में आडम्बरो की अंधी दौड़ में।।
अनावश्यक ध्वनि विस्तारक यंत्रों से।

सुनने की क्षमता से अधिक ध्वनियों का शोरगुल।।
मानव को तनावग्रस्त बना रहा है।।

पर्यावरण की रक्षा हेतु कदम बढ़ाना होगा।
   प्रदूषण को दूर भगाना होगा।।

रचयिता
रवीन्द्र नाथ यादव,
सहायक अध्यापक,  
प्राथमिक विद्यालय कोडार उर्फ़ बघोर नवीन,
विकास क्षेत्र-गोला,
जनपद-गोरखपुर।

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