नया सत्र
नया सत्र है नयी उमंगें,
है गुरुतर भार नया।
सबको अक्षर- ज्ञान मिले,
मन में ये संकल्प भरा।।
गलियाँ घूमूँ, घर -घर जाऊँ,
नामांकन की अलख जगाऊँ।
अशिक्षा है कंलक हमारा,
ये अभिभावक को समझाऊँ।।
बच्चे तो हैं छिपा खजाना,
कैसे इनको मैं चमकाऊँ।
योग्य नागरिक बनें देश के,
ज्ञान - सुधा इनको दे पाऊँ।।
है मेरी ये पावन इच्छा,
कर्म ज्ञान का पाठ पढ़ाऊँ।
संस्कारों का पोषण कर दूँ,
मानवता का हास सुनाऊँ।।
गर मिले प्रधान का साथ मुझे,
एस0एम0सी को प्रेरित कर दूँ।
वीणा की झंकार स्वरों की,
उनके घट-घट में, भर दूँ।।
बी0डी0सी0 का मिले साथ,
तो माननीयों का मान बढ़ाऊँ।
अभिभावक हों केवटहार सभी के,
फिर छात्र-छात्रा को अग्रणीय बनाऊँ।।
घर-घर बच्चा बने वैज्ञानिक,
हों परिवार में सभी कमाऊ।
जीवनशैली बदले सब की,
ज्ञान की घर-घर लगे प्याऊ।।
समरथ होवे जन-जन वासी,
भिक्षा को कभी हाथ न फैलाऊँ।
नव स्फूर्ति लिए साथ में,
तब विश्व गुरु कहलाऊँ।।
रचयिता
नरेन्द्र सैंगर,
सह समन्वयक,
विकास खण्ड-धनीपुर,
जनपद-अलीगढ़।
है गुरुतर भार नया।
सबको अक्षर- ज्ञान मिले,
मन में ये संकल्प भरा।।
गलियाँ घूमूँ, घर -घर जाऊँ,
नामांकन की अलख जगाऊँ।
अशिक्षा है कंलक हमारा,
ये अभिभावक को समझाऊँ।।
बच्चे तो हैं छिपा खजाना,
कैसे इनको मैं चमकाऊँ।
योग्य नागरिक बनें देश के,
ज्ञान - सुधा इनको दे पाऊँ।।
है मेरी ये पावन इच्छा,
कर्म ज्ञान का पाठ पढ़ाऊँ।
संस्कारों का पोषण कर दूँ,
मानवता का हास सुनाऊँ।।
गर मिले प्रधान का साथ मुझे,
एस0एम0सी को प्रेरित कर दूँ।
वीणा की झंकार स्वरों की,
उनके घट-घट में, भर दूँ।।
बी0डी0सी0 का मिले साथ,
तो माननीयों का मान बढ़ाऊँ।
अभिभावक हों केवटहार सभी के,
फिर छात्र-छात्रा को अग्रणीय बनाऊँ।।
घर-घर बच्चा बने वैज्ञानिक,
हों परिवार में सभी कमाऊ।
जीवनशैली बदले सब की,
ज्ञान की घर-घर लगे प्याऊ।।
समरथ होवे जन-जन वासी,
भिक्षा को कभी हाथ न फैलाऊँ।
नव स्फूर्ति लिए साथ में,
तब विश्व गुरु कहलाऊँ।।
रचयिता
नरेन्द्र सैंगर,
सह समन्वयक,
विकास खण्ड-धनीपुर,
जनपद-अलीगढ़।

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