नन्हें-नन्हें दीप सरीखे

नन्हें-नन्हें दीप सरीखे,
कोरे-कोरे मन के पट हैं।
जिज्ञासाएँ मन में जिनके,
कल्पित भावों के तट हैं।

पंछी उड़ते नीलगगन में,
वन में खगकुल कलरव।
रंगबिरंगी तितली उड़ती,
सपने मन के अभिनव।

जल में तैरे मछली देखो
कहाँ बनाती अपना घर?
आसमान क्यों नीला-नीला,
कैसे बादल छाए ऊपर?

एक गिलहरी पेड़ पे रहती,
कैसे फिर वह सोती है।
जंगल-जंगल रहते प्राणी,
घास हरी क्यों होती है?

अनगिन प्रश्न पूछते रहते,
गाड़ी एक बनाते हैं।
कागज की नाव बनाते,
फिर पानी में तैराते हैं।

उत्तर देकर उन्हें बताएँ,
समाधान हम करते जाएँ।
नेह भरे मन उन्हें बताएँ,
ज्ञान की ज्योति जलाएँ।

रचयिता
सतीश चन्द्र "कौशिक"
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अकबापुर,
विकास क्षेत्र-पहला, 
जनपद -सीतापुर।

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