सुबह का आलम आना है

लहरों के जीवन सागर में
         कितने तूफाँ का आना है
ये मंज़िल है न समझना
        कुछ दूर अभी भी जाना है
सपनों के मोती टूट गए
        उम्मीदों के शीशे न टूटें
एक हाथ है छूटा हाथों से
       इल्म की दौलत न छूटे
मांझी के गुजरे लम्हों को
     पतकों में सजाते जाना है
तेज़ हवाओं के झोंके
     दीप बुझाने आएँगे
पतझड़ का मौसम आने पर
     पत्ते भी मुरझाएँगे
 खार चुभे पैरों में लेकिन
       राह पर चलते जाना है
आँसू के बह जाने से
      तुम ख्वाब सजाना मत छोड़ो
वक्त के नाज़ुक हिस्से में
     खुदा की रहमत को मानो
हैं जख्म कई गहरे दामन पर
      दुआओं का मरहम लाना है
धूप के आँगन में कोई
      साथ भला देगा कब तक
कसमें वादों की महफ़िल में
      साया ही रह कुछ पल तक
माना कि रात बहुत लंबी है
    सुबह का आलम आना है।
         
रचयिता
प्रियब्रत मिश्र,
जनपद-जौनपुर।

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