कोई कजरी प्यासी न रहे

गर्मियों की छुट्टियाँ हो गयी थीं। सभी बच्चे अपने मित्रों के साथ खेलने-कूदने में मस्त थे। एक दिन राजू, रिंकू, गौरव अपने मित्रों के साथ नल के पाइप से नहा रहे थे और एक-दूसरे के ऊपर पानी की बौछार करके खेल रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि उनका मित्र मंगल एक और गुमसुम सा बैठा हुआ है। सभी बच्चों ने उससे अपने साथ नहाने और खेलने के लिए कहा। पर वह नहीं आया। तो सभी बच्चे उसके पास आ गए और उससे उदास होने का कारण पूछा। तो मंगल की आँखों में आँसू आ गये। उसने बताया कि गाँव में उसके दादा जी रहते हैं। उनके पास एक कजरी गाय थी और उसका एक प्यारा सा बछड़ा था गोलू। हम सब उसे प्यार से गोलू ही कहते थे। जब मैं छुट्टियों में घर जाता था तो गोलू के साथ खूब खेलता था। उसको चारा खिलाता था। जब वह बाड़े में कुलांचें भरता था तो मैं उसके आगे पीछे दौड़ता था। उसके साथ पता ही नहीं चलता था कि छुट्टियाँ कब खत्म हो गईं।
        पर इस साल सूखा के कारण गाँव में पानी की बहुत कमी हो गयी है। बेचारे बूढ़े दादा जी पानी के लिए बहुत परेशान हो गए। वे अपने लिए ही पानी नहीं जुटा पा रहे थे तो गाय और बछड़े के लिए पानी कहाँ से लाते। बस पानी की कमी से गाय बीमार हो गई और मर गयी तथा कुछ दिन बाद उसका बछड़ा गोलू भी इस दुनिया से चला गया। मुझे अब उसकी बहुत याद आती है। यह कहकर मंगल फूट-फूट कर रो पड़ा। सारे बच्चे सुनकर अवाक् रह गए। अब उनको अपनी गलती का अहसास हुआ। उनकी समझ में आ गया कि जिस पानी की कमी के कारण उनके मित्र मंगल की प्यारी कजरी गाय और गोलू उससे बिछुड़ गए हैं उसी पानी को हम बर्बाद कर रहे हैं।
      उन सबने मंगल के आँसू पोंछे और कहा कि तुम्हारी कजरी और गोलू को तो हम वापस नहीं ला सकते पर दूसरी कजरी और गोलुओं को तो हम बचा सकते हैं। आओ हम सब अपने घरों के सामने पशुओं के पीने के लिए पानी रखें और छतों पर चिड़ियों के लिए दाना और पानी रखें। ताकि कोई पशु-पक्षी पानी के अभाव में काल का गाल न बन सके। यह सुनकर मंगल खुश हो गया और निकल पड़ा सभी बच्चों के साथ पशु-पक्षियों की प्यास बुझाने। 

लेखिका
जमीला खातून, 
प्रधानाध्यापक, 
बेसिक प्राथमिक पाठशाला गढधुरिया गंज, नगर क्षेत्र मऊरानीपुर, 
जनपद-झाँसी।

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