अशिक्षित अम्मा की शिक्षित सोच
उस दिन अम्मा ने मुझे काजल लगाया था,
नहला करके, सुंदर सजाया था।
कभी हाथ पकड़कर, कभी गोद लेकर, कभी पैदल चली थी,
इस तरह अम्मा के साथ मैं पहली बार स्कूल गयी थी।
स्कूल में मैडम ने मुझे थोड़ा सा प्यार किया था,
प्यारी गुड़िया रोज स्कूल आओगी यह प्रश्न बार-बार किया था।
अम्मा ने पहले से ही मुझे समझाया था,
पढ़ना ज़रूरी है यह बतलाया था।
अम्मा के पल्लू से झाँककर मैंने हाँ किया था,
खुले आसमान में उड़ने के लिए जैसे मैंने पंख लिया था।
अम्मा ने खुशी से मुझे गले लगाया था,
एक चुम्मा भी प्यार से गाल पर चिपकाया था।
अपनी बेटी पढ़ाऊँगी जीवन में आगे उसे बढ़ाऊँगी,
ईश्वर से खुशियाँ तभी घर ला पाऊँगी।
अम्मा ने मैडम को मेरा नाम बताया था,
अपना नाम वह भूल गयी यह कई बार मैडम को समझाया था।
लड़कपन पर बिट्टी, फिर "मुनिया की अम्मा" सब कहते थे,
अपना नाम सुना नहीं कभी गुमनामी में रहते थे।
अपना जीवन रो रोकर खोया,
चूल्हा चौके बर्तन ने मेरा जीवन धोया।
बेटी अपनी पढाऊँगी शिक्षा के पंख उसे लगाऊँगी,,,,
आपकी जैसी मैडम उसे भी कहलवाऊँगी ऊँची कुर्सी पर उसे भी बिठवाऊँगी।
चहकेगी जब खुले आसमान में मन मेरा हर्षायेगा,
देखके उसे उसके बापू को भी उस पर भरोसा आएगा।
बेटा नहीं उसके भाग्य में, यह दुःख उसके बापू का दूर हो जाएगा,
बेटी बेटे से कम नहीं, इस बात का भी पता उसके बापू को चल जाएगा।
खुशी से वो भी उसे रोज स्कूल लेके आएगा,
सारे दुःख छोड़कर वो भी झूम-झूमकर गायेगा।
कि बेटी को पढ़ाएँगे,,,,,
जीवन में आगे बढ़ाएँगे।
रचयिता
वर्तिका अवस्थी,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय देवामई(अंग्रेजी माध्यम),
विकास क्षेत्र-मैनपुरी,
जनपद-मैनपुरी।
नहला करके, सुंदर सजाया था।
कभी हाथ पकड़कर, कभी गोद लेकर, कभी पैदल चली थी,
इस तरह अम्मा के साथ मैं पहली बार स्कूल गयी थी।
स्कूल में मैडम ने मुझे थोड़ा सा प्यार किया था,
प्यारी गुड़िया रोज स्कूल आओगी यह प्रश्न बार-बार किया था।
अम्मा ने पहले से ही मुझे समझाया था,
पढ़ना ज़रूरी है यह बतलाया था।
अम्मा के पल्लू से झाँककर मैंने हाँ किया था,
खुले आसमान में उड़ने के लिए जैसे मैंने पंख लिया था।
अम्मा ने खुशी से मुझे गले लगाया था,
एक चुम्मा भी प्यार से गाल पर चिपकाया था।
अपनी बेटी पढ़ाऊँगी जीवन में आगे उसे बढ़ाऊँगी,
ईश्वर से खुशियाँ तभी घर ला पाऊँगी।
अम्मा ने मैडम को मेरा नाम बताया था,
अपना नाम वह भूल गयी यह कई बार मैडम को समझाया था।
लड़कपन पर बिट्टी, फिर "मुनिया की अम्मा" सब कहते थे,
अपना नाम सुना नहीं कभी गुमनामी में रहते थे।
अपना जीवन रो रोकर खोया,
चूल्हा चौके बर्तन ने मेरा जीवन धोया।
बेटी अपनी पढाऊँगी शिक्षा के पंख उसे लगाऊँगी,,,,
आपकी जैसी मैडम उसे भी कहलवाऊँगी ऊँची कुर्सी पर उसे भी बिठवाऊँगी।
चहकेगी जब खुले आसमान में मन मेरा हर्षायेगा,
देखके उसे उसके बापू को भी उस पर भरोसा आएगा।
बेटा नहीं उसके भाग्य में, यह दुःख उसके बापू का दूर हो जाएगा,
बेटी बेटे से कम नहीं, इस बात का भी पता उसके बापू को चल जाएगा।
खुशी से वो भी उसे रोज स्कूल लेके आएगा,
सारे दुःख छोड़कर वो भी झूम-झूमकर गायेगा।
कि बेटी को पढ़ाएँगे,,,,,
जीवन में आगे बढ़ाएँगे।
रचयिता
वर्तिका अवस्थी,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय देवामई(अंग्रेजी माध्यम),
विकास क्षेत्र-मैनपुरी,
जनपद-मैनपुरी।

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