हमारे बच्चे क्यों नहीं सीख पाते

आदरणीय साथियों,
मन में बड़ी बैचेनी थी कि बच्चे तेजी से सीखते क्यों नहीं जबकि हम जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं। हमारी मेहनत में कमी नहीं फिर भी परिणाम अपेक्षित नहीं।
गहन विचार के बाद कुछ बातें समझ में आयी।
1. हम बच्चों को अपने हिसाब से सिखाना चाहते हैं, बच्चों के सीखने के हिसाब से नहीं चलना चाहते। जबकि NCF के अनुसार our teaching principals should be based on learning principals.
जबकि हम यह मान बैठे हैं कि Learning principals should be based on our teaching principals.
बस यही वो गलती है जिसको हम लगातार करते आ रहे हैं और बदलने को तैयार भी नहीं हैं।
हमें किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये इन बातों पर विचार करना होगा।
1. हम किस तरह से पढ़ा रहे हैं?
2. हमारी मान्यताएँ क्या हैं?
3. इसके क्या परिणाम आ रहे हैं?
4. हमें करना क्या चाहिए?
5.क्या हमें अपनी कार्य पद्धति को बदलने की जरूरत है?
        हम कर क्या रहे हैं?
अगर ध्यान से देखें तो हम निम्नलिखित कार्य कर रहे हैं
1. पढ़ाने के नाम पर हम उन पाठ्यपुस्तकों को पूरा करा रहे हैं जो किसी कक्षा विशेष के लिये निर्धारित होती हैं।
2. हम जीजान से पढ़ाने में जुटे हुए हैं। कक्षा में घुसते ही बोर्ड पर लिखना और बोलना शुरू कर देते हैं और लगभग 90 से 95% समय तक हमारा यही क्रम रहता है। हम खुश होते हैं कि हमने उच्च स्तर का ज्ञान देते हुए पढ़ा दिया है।
इस पूरे समय मे बच्चों ने क्या किया? केवल मूकदर्शक बनकर बोर्ड से उन चीजों को उतार लिया।
जरा सोचिए क्या यह पढ़ाना हुआ?
क्या हमने बच्चों के अनुभवों को महत्व दिया? नहीं। फिर बच्चा भी आपके अध्यापन को महत्व क्यों दे।
आप बार-बार उन्हीं चीजों पर बच्चों को घुमा रहे हो जो उसको आती हैं।
उदाहरण के लिए हम मरोद्भिद पादप पढा रहे है तो हम मरोद्भिद पादपों की परिभाषा व उनकी विशेषताएँ एवं उनके उपयोग बोर्ड पर लिखा देते हैं जिन्हें बच्चे पहले से और आपसे ज्यादा अच्छी तरह से जानते हैं। अगर आपने बच्चों की जानकारी को ही बाहर निकाल लिया होता तो ना तो आपको इतनी मेहनत से लिखने की जरूरत थी और ना बालकों को रटकर याद करने की।
NCF कहता है बच्चों के अनुभवों को बाहर निकालकर उन्हें व्यवस्थित कर दीजिए बस।
उनको ज्यादा से ज्यादा उदाहरण दीजिए, उन उदाहरणों से अपनी तरह से अपनी भाषा में व अपनी समझ से नियम बनाकर अपनी परिभाषा तैयार करने दीजिए। उन्हें एसा माहौल दें कि वे अपने ज्ञान का निर्माण स्वयं कर सकें। इसके लिए उन्हें समय दीजिए अपना समय कम कीजिए। 20% से ज्यादा समय आपको नहीं लेना है। 80% समय बच्चों के द्वारा प्रयोग किया जाना चाहिए।
3.हम बच्चों को जाते ही कहते हैं चलो बच्चों किताब निकालो आज फलां पाठ पढ़ेंगे। यह सुनते ही बच्चों के मन में  बोझ सा पड़ने लगता है। जबकि होना ये चाहिए कि हम बच्चों को यह एहसास कराएँ कि हम वार्तालाप कर रहे हैं। नयी जानकारी को बच्चों के अनुभवों से जोड दें।
4.भाषा पढ़ाते समय हम अलग से व्याकरण को अलग से पढ़ाते हैं जिनका उपयोग व्यवहार में करने में बच्चे कठिनाई महसूस करते हैं। होना यह चाहिए कि हम बच्चों को व्याकरण भी communication के दौरान उदाहरण देकर प्रयोग करके सिखायें। हम जो अलग से व्याकरण के नियम सिखाने मे समय लगाते हैं उसका उपयोग बालक को स्वयं करने दीजिए। बालको को 3,4 उदाहरण देकर वहीं अभ्यास करा दीजिए बच्चे खुद ही नियम बना लेंगे।
5. हम यह मान बैठे हैं कि बच्चे कुछ नहीं जानते वो कुछ भी नहीं कर पाएँगे। अरे साहब इस मिथक से बाहर तो निकलिए बच्चों पर विश्वास तो कीजिए।
6. आजकल एक trend चल पडा है गतिविधि कराने का। गतिविधि के नाम पर व्याकरण का topic लिया और कुछ क्रियायें करा दी और उन्हें रटाकर video बनाकर facebook, whatsapp, U tube पर डाल देते हैं। ध्यान से देखें तो उनमे चिन्तन व अनुप्रयोगों का नितांत अभाव होता है। नतीजा वो ज्ञान उस गतिविधि के साथ ही समाप्त हो जाता है। आपकी गतिविधि में चिन्तन व अनुप्रयोग होने चाहिए तभी आपकी गतिविधि निष्कर्ष तक पहुँच पाएगी।
मित्रो यदि आपको अपने आपको पुनःस्थापित करना है समाज में प्रतिष्ठा पानी है तो  CLT को अपनाना होगा GLT को छोड़ना होगा।
Lecture की जगह activity को महत्व देना होगा।
बच्चों को अपना ज्ञान निर्माण करना सिखाना होगा।
बच्चों को अपना दोस्त बनाना होगा ताकि वे भी हमे अपना mentor समझने लगे।
Time ratio 20% teacher व 80% छात्रों का करना होगा।
अपनी भाषा एवं पद्धति को सरल बनाना होगा।
हमारा उद्देश्य कोर्स पूरा कराना ना होकर बच्चों के मन में समझ आने पर जोर देना होगा।
व्याकरण के topics अलग से नहीं पढ़ाकर वार्तालाप के बीच में ज्यादा से ज्यादा उदाहरण देकर व्यावहारिक रुप मे समझाइए।  टुकड़ों में पढ़ायी हुई व्याकरण ठीक वैसी ही है जैसे, हाथ, पाँव, मुँह, नाक, कान, बाल, रंग रूप के वर्णन के आधार पर किसी व्यक्ति का अनुमान लगाना। अगर बजाय वर्णन करने के उस सम्पूर्ण व्यक्ति को ही सामने खड़ा करके वर्णन खुद बच्चों को ही करने दें तो भ्रम की स्थिति ही पैदा ही नहीं होगी।

लेखक
सत्यनारायण शर्मा,
सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य, 
धौलपुर, राजस्थान।

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