प्रकृति की सीख

जानो-जानो तुम सब जानो,
           प्रकृति चाहती क्या कहना।
पर्वतों से सीखो बच्चों,
          दृढ़ होकर स्थिर रहना॥ 

जानो-जानो तुम सब जानो ....

बहती हुई पवन से सीखो,
          बिना थके चलते रहना।
नदियों का जल बतलाता है,
           मन का चंचल बनकर हँसना॥

जानो-जानो तुम सब जानो ....

वृक्ष हमें सिखला जाते,
            निःस्वार्थ सेवा की भावना।
वर्षा का झरता पानी बोले,
             दुखियों का दुःख हर जाना॥

जानो-जानो तुम सब जानो ....

सूरज से सीखो तुम सब,
              हँसते-हँसते जल जाना।
रात जागकर चाँद बताता,
              औरों को शीतलता देना॥

जानो-जानो तुम सब जानो ....

पृथ्वी की भी सीख समझ लो,
               बोझ उठा बस हँस देना।
सागर की लहरें बतलातीं,
               गिर-गिर के फिर उठ जाना॥

जानो-जानो तुम सब जानो,
              प्रकृति चाहती कुछ कहना॥

रचयिता 
गीता यादव,
प्रधानाध्यपिका,
प्राथमिक विद्यालय मुरारपुर,
विकास खण्ड-देवमई,
जनपद-फ़तेहपुर।

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