कष्टों को सहते देखा है
अपने गुरुओं की आँखों में,
इक ख्वाब को पलते देखा है।
हम बच्चों की खातिर उनको,
कष्टों को सहते देखा है।
माघ महीने की ठंडी हो,
चाहें कड़ी दुपहरी।
भादों की बरसात हो चाहें,
बिजली कड़के गहरी।
विद्यालय में हमने उनको,
सदा पढ़ाते देखा है,
हम बच्चों की खातिर उनको
कष्टों को सहते देखा है।
बड़े-बड़े महापुरुषों की,
बातें हमें बताते ।
सदाचार और ज्ञान की बातें,
हमको सदा बताते।
ममता और करुणा के सागर को
उनमें छलकते देखा है।
हम बच्चों की खातिर उनको
कष्टों को सहते देखा है।
करें शरारत कहीं अगर हम,
तभी डाँटते जोर से।
ऐसे में गुरुजी हमको,
लगते बड़े कठोर से।
कक्षा में उनकी पढ़करके उन्हें,
बच्चों सा हँसते देखा है।
हम बच्चों की खातिर उनको,
कष्टों को सहते देखा है।
माँ के जैसे प्यार करें और,
पापा के जैसे डाँटे।
मिलकरके हम बच्चों के संग,
सुखों-दुखों को बाँटे।
गुस्से में हमें मारकर,
उनको रोते देखा है।
हम बच्चों की खातिर उनको,
कष्टों को सहते देखा है।
रचयिता
अशोक कुमार,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय रामपुर कल्याणगढ़
विकास खण्ड-मानिकपुर,
जनपद-चित्रकूट।
इक ख्वाब को पलते देखा है।
हम बच्चों की खातिर उनको,
कष्टों को सहते देखा है।
माघ महीने की ठंडी हो,
चाहें कड़ी दुपहरी।
भादों की बरसात हो चाहें,
बिजली कड़के गहरी।
विद्यालय में हमने उनको,
सदा पढ़ाते देखा है,
हम बच्चों की खातिर उनको
कष्टों को सहते देखा है।
बड़े-बड़े महापुरुषों की,
बातें हमें बताते ।
सदाचार और ज्ञान की बातें,
हमको सदा बताते।
ममता और करुणा के सागर को
उनमें छलकते देखा है।
हम बच्चों की खातिर उनको
कष्टों को सहते देखा है।
करें शरारत कहीं अगर हम,
तभी डाँटते जोर से।
ऐसे में गुरुजी हमको,
लगते बड़े कठोर से।
कक्षा में उनकी पढ़करके उन्हें,
बच्चों सा हँसते देखा है।
हम बच्चों की खातिर उनको,
कष्टों को सहते देखा है।
माँ के जैसे प्यार करें और,
पापा के जैसे डाँटे।
मिलकरके हम बच्चों के संग,
सुखों-दुखों को बाँटे।
गुस्से में हमें मारकर,
उनको रोते देखा है।
हम बच्चों की खातिर उनको,
कष्टों को सहते देखा है।
रचयिता
अशोक कुमार,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय रामपुर कल्याणगढ़
विकास खण्ड-मानिकपुर,
जनपद-चित्रकूट।

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