संकल्प

सपनों की बंजर धरती पर,
       कुछ स्वप्न सलोने रोपे। 
उन नन्हें बीजों को सींचा,
       ममता के पावन जल से।
आसान नहीं थी राह मगर,
       अविरल था चलना मुझको।
आशा और निराशा मिलकर,
       पकड़े थे दामन मेरा।
ले फिर भी संकल्प यह मन में,
       छोड़ो ना दामन इनका।
थोड़ा सा विश्वास जगा दूँ,
       बेहतर यह दुनिया तुमसे।
स्वप्न दिखें इनको भी ऐसे,
      आएँ हम भी काम किसी के।
अनगढ़ इन कोमल हाथों से,
      छुड़वा दूँ भीख कटोरे की।
उन हाथों में थमा कलम,
      पसरे जो द्वार चौराहों पर।
दुर्बल हाथों की बन बैसाखी,
      अक्षर से नाता जोड़ा।
दिखा ज्ञान का आलय इनको,
      जोड़ा फिर उन्मुक्त गगन से।
उन बीजों से फूटा अंकुर,
       लहराई पौध धरा पर।
कटोरे से आला दुनिया कलमों की,
        मन में ऐसी आस जगा दी।
 करें दुआ हम सब यह मिलकर,
       ये लगन न अपनी बिसरे।।
             
रचयिता
संगीता कोठियाल फरासी,
सहायक अध्यापिका,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय गहड़,
विकास खण्ड-खिर्सू, 
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

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