सूरज, चंदा और तारे

सुबह-सवेरे  आऊँ जग में,
सारा जग चमकाऊँ पल में।

फूल हैं सारे खिल-खिल जाते,
मुझे  देख  वो  सब  मुस्काते।

नई  स्फूर्ति जगाऊँ सब में,
मौसम रंगीन बनाऊँ क्षण में।

शाम  ढले  मैं घर  को  जाऊँ,
बच्चों का सूरज चाचू कहलाऊँ। 

सोलह रूपों में मैं दिखता,
चन्द्रकलाएँ जिन्हें कहते।

सबका प्यारा हूँ मैं जग में,
चंदा मामा मुझे बच्चे कहते।

मैया  की  लोरी  का  मैं  हीरो,
लेकिन प्रकाश में बिल्कुल जीरो।

सूरज से प्रकाश मैं पाऊँ,
फिर सारे जग को चमकाऊँ।

नीलगगन में टिम-टिम करते,
स्वप्रकाश से हम हैं चमकते।

दूर  बहुत  हम  तुमसे रहते,
इसीलिए नन्हें से हैं दिखते।

सूरज  से  आकार  बड़ा  है,
ध्रुवतारा देखो अटल खड़ा है।

हम नभ की शोभा हैं बढ़ाते,
सप्तर्षि  भी  हम  कहलाते।

लोग  हमें  हैं  तारा कहते,
जग में सबका प्यारा कहते।

रचयिता
नीलम कौर,
सहायक अध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय शाहबाजपुर,
विकास खण्ड-सिकन्दराबाद,
जनपद-बुलंदशहर।

Comments

Total Pageviews