रानी लक्ष्मी बाई

हर  नारी  का  मान  बनी
जन्मे  थी  जो  काशी  में
मनु  छबीली  नाम उनका
ब्याही  गई  वह झाँसी  में

गंगाधर संग उनका ब्याह हुआ
बनी  दुल्हन  नई  नवेली  वो
शक्ति  स्वरूपा  मर्यादित  थी
राजन प्रिया  हुई अलबेली वो

मृत्यु   हुई  असमय  राजा  की
ग़म  के  बादल उसपे  टूट  पड़े
लक्ष्मी हुई अब बिल्कुल अकेली
राज्य हड़पने को दुश्मन टूट पड़े

सन् 1857  की  जंग  में  हुंकार भरा
आजादी को तान दिया तलवार खड़ा
कूद  पड़ी  जंग-ए-आजादी  में  खुद
बून्देलों से मर्दानी  उनका  नाम पड़ा

बुंदेलों  की  पावन  धरती  पर
लक्ष्मी  बिजली सी तड़की थी
चमक उठी  तलवारें  फिर  से
गौरव  झाँसी  की  भड़की  थी

वायु वेग  से  चलती वह मर्दानी थी
खूब लड़ी वो झाँसी  वाली रानी थी
मातृत्व  बोझ  पीठ  पर  लिए लड़ी
ऐसी  लक्ष्मी  बाई  स्वाभिमानी  थी

थर्राया  दुश्मन  भी  नमन  किया
नारी  वह नर  सी  अभिमानी थी
प्राणों  की  आहुति  देकर  उसने
इतिहास  में  अमर  कहानी  की

जन्मी  थी  जो  काशी  में
झाँसी  वाली वह रानी थी
शत्-शत्  नमन  उन्हें मेरा
झाँसी की वो रखवाली थी

रचयिता
वन्दना यादव "गज़ल"
अभिनव प्रा० वि० चन्दवक,
डोभी, जौनपुर।

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