बचपन कितना प्यारा होता
बचपन कितना प्यारा होता,
बचपन में हर बच्चा राजा होता।
बचपन बचपन ही होता,
हर बच्चा मासूम होता,
दादी बाबा का लाडला बनता,
माँ की आँखों का तारा होता।
बचपन कितना प्यारा होता।
बुआ और बाबा कहने पर,
घर में धन बरसता है,
ऐसे ही बचपन पाने को,
यह मन बार-बार तरसता है।
बचपन कितना प्यारा होता।
कोमल मन में उत्पातों का,
रह रहकर सैलाब उमड़ता,
दूसरे को चुटकी काटकर,
सबके सामने स्वयं रोता।
बचपन कितना प्यारा होता।
बारिश जब होती,
नाली में कागज का जहाज तैरता।
बार-बार भीगने को,
ओम का दिल है मचलता।
बचपन कितना प्यारा होता।
हँसना और रोना, रोकर के रूठ जाना,
कितना अच्छा लगता,
सब के संताप को,
यह मोहक रूप क्षण में हरता,
बचपन कितना प्यारा होता।
कहता है 'ओम' यही,
जीवन बचपन का ही सच्चा होता,
बचपन के जीवन को,
पुनः पाने को जीवन, जीवन भर है तरसता।।
रचयिता
ओम प्रकाश श्रीवास्तव,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय उदयापुर,
विकास खण्ड-भीतरगाँव,
जनपद-कानपुर नगर।
बचपन में हर बच्चा राजा होता।
बचपन बचपन ही होता,
हर बच्चा मासूम होता,
दादी बाबा का लाडला बनता,
माँ की आँखों का तारा होता।
बचपन कितना प्यारा होता।
बुआ और बाबा कहने पर,
घर में धन बरसता है,
ऐसे ही बचपन पाने को,
यह मन बार-बार तरसता है।
बचपन कितना प्यारा होता।
कोमल मन में उत्पातों का,
रह रहकर सैलाब उमड़ता,
दूसरे को चुटकी काटकर,
सबके सामने स्वयं रोता।
बचपन कितना प्यारा होता।
बारिश जब होती,
नाली में कागज का जहाज तैरता।
बार-बार भीगने को,
ओम का दिल है मचलता।
बचपन कितना प्यारा होता।
हँसना और रोना, रोकर के रूठ जाना,
कितना अच्छा लगता,
सब के संताप को,
यह मोहक रूप क्षण में हरता,
बचपन कितना प्यारा होता।
कहता है 'ओम' यही,
जीवन बचपन का ही सच्चा होता,
बचपन के जीवन को,
पुनः पाने को जीवन, जीवन भर है तरसता।।
रचयिता
ओम प्रकाश श्रीवास्तव,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय उदयापुर,
विकास खण्ड-भीतरगाँव,
जनपद-कानपुर नगर।

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