115/2024, बाल कहानी- 11 जुलाई
बाल कहानी- अनाथ मोर
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एक जंगल में बहुत ही छोटा मोर रहता था। उसका कोई नहीं था। वह अनाथ था। जंगल के सभी जानवर उसकी हँसी उड़ाते और कहते थे कि-, "हमारे तो माता-पिता हैं और तुम्हारा तो कोई नहीं है। तुम अनाथ हो।"
यह सुनकर छोटे मोर को बहुत दुःख होता। वह चुपचाप रहता, घूमता, खाता-पीता और आराम करता। वह किसी से कोई बात नहीं करता।
इस तरह बहुत दिन बीतते गये। समय की बात है कि एक बार सभी जानवरों के बच्चे जंगल में खेल रहे थे। मोर का बच्चा भी वहीं एक ओर खेल रहा था। तभी अचानक सभी जानवरों के बच्चे चीख-पुकार कर भागे। छोटे मोर ने कहा-, "क्या हुआ?" उसकी किसी ने नहीं सुनी। तभी छोटे मोर की निगाह जानवरों की ओर भागते हुए एक विशाल काले सर्प पर पड़ी, जो उनकी ओर दौड़ा जा रहा था। छोटे मोर ने तुरन्त सर्प को अपनी चोंच में दबाया और उड़कर भागते जानवरों के बच्चों के आगे आकर खड़ा हो गया। सभी जानवरों के बच्चे भयभीत होकर ठिठक गये। उन्होंने कहा कि-, "इसे यहाँ मत छोड़ना, अन्यथा यह हम सबको काट लेगा। हम लोग तुम्हें कभी नहीं सतायेंगे। हम सब तुम्हें अपने साथ खिलायेंगे और साथ में रखेंगे। हम सब तुम्हारे साथ हैं। हम सब तुम्हारे हैं। तुम अब अनाथ नहीं हो।" यह सुनकर छोटा मोर बहुत खुश हुआ और सोचने लगा कि-, "जो काम कोई नहीं कर सका, वह इस सर्प ने कर दिया। ये हमारा सबसे बड़ा हितैषी है। अतः इसे मारना नहीं है। इसके कारण हमें सबका साथ मिला है।" यह सोचकर उसने उड़कर बहुत दूर एक पहाड़ी पर उसे छोड़कर उसे 'धन्यवाद' दिया। इसके बाद वह सभी जानवरों के बच्चों के पास आ पहुँचा, जो उसका इन्तजार कर रहे थे। सभी ने उसका स्वागत किया और उसे अपने हाथों पर उठाकर घुमाया और फिर शाम को सभी हँसते-हँसाते अपने-अपने घरों को लौट आये।
संस्कार सन्देश-
हमें किसी को अनाथ नहीं समझना चाहिए। सभी में कुछ न कुछ विशिष्ट शक्ति और गुण होते हैं।
लेखक-
जुगल किशोर त्रिपाठी
प्रा० वि० बम्हौरी (कम्पोजिट)
मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)
कहानी वाचक-
नीलम भदौरिया
जनपद- फतेहपुर (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम मिशन शिक्षण संवाद
नैतिक प्रभात
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