113/2024, बाल कहानी- 09 जुलाई
बाल कहानी- रुचिपरक शिक्षण
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एक गाँव में मेघा और प्रेरणा दो बालिकाएँ रहती थीं। दोनों आपस मे बहुत अच्छी सहेलियाँ थी। अभी उनकी उम्र विद्यारम्भ की हुई ही थी कि उनके माता-पिता ने उनका दाखिला गाँव के ही सरकारी स्कूल में करवा दिया।
दोनों नियमित विद्यालय जाती और हर खेल प्रतियोगिता और अन्य विद्यालय में आयोजित प्रतियोगिताओं में रुचिपूर्वक भाग लेती थी।
उन दोनों की सभी विद्यालय के अध्यापक और गाँव के लोग खूब तारीफें करते थे।
दोनों अब प्राइमरी स्कूल से निकलकर जूनियर स्कूल में पहुँच गयीं और उनका प्रदर्शन भी पहले की तरह ही चलता रहा।
स्कूल से ही उन्होंने जिला और राज्यस्तरीय खेलों में भी भाग लेकर अपने गाँव और विद्यालय के साथ पूरे क्षेत्र का नाम रोशन किया।
अब इन दोनों का दाखिला शहर के हाई स्कूल में हुआ तो उनके माता-पिता द्वारा समझाया गया कि अब उन्हें खेलने से ज्यादा पढ़ने पर ध्यान देना है। अब माता-पिता के कहे अनुसार उन्होंने पढ़ाई पर अधिक ध्यान दिया। उनका खेल में प्रदर्शन खराब होता गया और इस वर्ष उन्हें जिला-स्तर पर ही हार का मुँह देखना पड़ा।
बाद में जब समीक्षा की गई कि ऐसा क्यों हुआ तो पाया कि मेघा और प्रेरणा ने हाई स्कूल में आते ही खेलों का अभ्यास बन्द कर, पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान लगाया।
उसके बाद जिला स्तरीय खेल प्रशिक्षकों एवं अध्यापकों ने मेघा और प्रेरणा के साथ-साथ उनके माता-पिता को समझाया कि हर चीज़ का हम सभी के जीवन में महत्व होता है।
रुचिकर चीजों पर पाबन्दी लगाना प्रतिभाओं का दमन करना है।
इस बात को समझकर बच्चों को माता-पिता द्वारा भी छूट दी गयी और आगामी खेलों में उन दोनों का प्रदर्शन भी बहुत अच्छा रहा।
संस्कार सन्देश-
किसी भी प्रकार की रुकावट बच्चों के वृद्धि एवं विकास को बाधित करती है।
लेखक-
धर्मेंद्र शर्मा (स०अ०)
कन्या० प्रा० वि० टोडी-फतेहपुर गुरसरांय, झाँसी (उ०प्र०)
कहानी वाचक-
नीलम भदौरिया
जनपद- फतेहपुर (उ०प्र०)
✏️संकलन-
📝टीम मिशन शिक्षण संवाद
नैतिक प्रभात
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