112/2024, बाल कहानी- 08 जुलाई


बाल कहानी- चिड़िया के बच्चे
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रोज की तरह आज भी मोहन जल्दी उठ गया। उसे आज चिड़ियों का प्रातःकालीन कलरव सुनाई नहीं पड़ रहा था। उसे चिन्ता होने लगी। वह सोचने लगा, आखिर रोज तो इस समय चिड़ियों तथा उनके बच्चों की चहचहाहट आने लगती थी, फिर
आखिर आज क्या हो गया है?
अहाते में अभी धुँधला था। कुछ साफ-साफ दिखाई नहीं पड़ रहा था। उजाला होने का इन्तजार करने लगा। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि अहाते में जो नीम का बड़ा सा पेड़ था, उसके नीचे बहुत सी छोटी-छोटी टहनियाँ टूटी हुई बिखरी पड़ी हैं। वह पेड़ पर रखे हुए चिड़ियों के घोंसलों को खोजने लगा, पर वे कहीं दिखाई नहीं पड़ रहे थे। वह बहुत परेशान था। रुआँसा हो गया। उसकी हालत देखकर मम्मी समझ गयीं कि मोहन चिड़िया के बच्चों के लिए परेशान है।
मम्मी ने मोहन को बताया कि रात में बड़ी तेज बारिस हुई है। आँधी भी आई थी। उसी के झोंके और झटके से ये टहनियाँ टूटकर बिखर गयीं हैं। घोंसले भी गिर गये हैं। चिड़ियाँ अपने बच्चों को लेकर कहीं उड़ गयी होंगी। तभी मोहन की निगाह एक टहनी के नीचे गयी। उसने टहनी हटाई तो देखा कि चिड़िया के तीनों बच्चे बैठे काँप रहे थे। मम्मी की मदद से उसने बच्चों को उठा लिया। सूखे कपड़े से पोंछकर उनको सुखाया। अब हल्की धूप भी निकल आयी थी। मम्मी के कहने पर उसने तीनों बच्चों को मुंडेर पर बैठा दिया। धीरे-धीरे कई चिड़ियाँ बच्चों के पास आ गयीं। चिड़ियाँ और बच्चे एक-दूसरे की तरफ मुँह करके पंख फड़फड़ाकर चहचहाने लगे। देखते-देखते सभी चिड़ियाँ अपने साथ बच्चों को उड़ा ले गयीं।

संस्कार सन्देश-
जीव-जन्तु बोल नहीं सकते हैं, अतः हमें उनकी अवश्य सहायता करनी चाहिए।

लेखक-
रामचन्द्र सिंह (स०अ०)
प्रा० वि० जगजीवनपुर -2
ऐरायाँ- फतेहपुर (उ०प्र०)

कहानीवाचन-
नीलम भदौरिया
जनपद- फतेहपुर (उ०प्र०)

✏️संकलन
📝टीम मिशन शिक्षण संवाद
नैतिक प्रभात

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