मैं खुश हूँ तू उदास है क्यूँ

जन्म लिया आँचल में माँ के
फिर मनुष्य हताश है क्यूँ?
मैं खुश हूँ तू उदास है क्यूँ?

सूरज तुमको धूप ना देता
क्या नदियाँ कुछ फर्क करें?
हवा बहे नित आँगन में
क्यों तू व्यर्थ में तर्क करे!

माँ होकर मैं पोषण करती
भेद नहीं मेरा आधार
सबको एक दृष्टि से देखूँ
सम्पन्न कोई हो या लाचार

अपने अंधे लालच में बेबस
और लाचार है क्यूँ?
मैं खुश हूँ तू उदास है क्यूँ?

मैं मनुष्य बुद्धि का पुतला 
क्यों इतना संतोष करूँ?
माँ नहीं प्रकृति दासी है मेरी
मैं जो चाहे प्रयोग करूँ!!!

दुनिया करूँगा मुट्ठी में मैं
होगा तेरा अस्तित्व नहीं
बन जाऊँगा ईश्वर जग का
मैं तेरा परिशिष्ट नहीं।

विनाश करके प्रकति का तूने
सोच किसका विनाश किया?
अपने हाथों से ही तूने प्रकृति का ह्रास किया।

आज ऐसी परिस्थिति में बैठा यूँ निराश है क्यूँ?
मैं तो खुश थी कल भी अब भी
लेकिन तू उदास है क्यूँ?????

रचयिता
डॉ0 रेणु देवी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय नवादा, 
विकास खण्ड व जनपद-हापुड़।

Comments

  1. Khoobsurat likha h madam apne

    ReplyDelete
    Replies
    1. Bhut hi sundar shabdon me prakriti ki vyatha ko vyakt kiya hai mam aapne

      Delete

Post a Comment

Total Pageviews