नन्हा बचपन

ये नन्हा बचपन है,
इसको यूँ डराओ ना।
 सुन लो इसके मन की बात,
 यूँ इसको चुप कराओ ना।
 आज अगर यह चुप हो गया तो,
 फिर कभी ना बोल पाएगा।
प्रतिभा घुटकर दब जाएगी,
उड़नपंख ना खोल पायेगा।
बिना बात किए तुम इसको,
कैसे समझ पाओगे?
अगर सही ना समझ पाए तो,
कैसे राह दिखाओगे?
भय दिखाकर अनुशासित,
कब तक कर पाओगे?
यदि सिखा पाए स्वानुशासन तो,
जीवन सफल बनाओगे।
सिर्फ लिखना- पढ़ना सीख पाना,
ये जीवन का सार नहीं,
चुनौतियों से लड़ना सीखें,
समझे जीवन को भार नहीं
बन जाए आत्मविश्वासी,
निर्भय होकर बात कहें।
जीवन में सुख आए या दु:ख,
समरूप हँसकर सहे।
मिला है मानव जीवन दुर्लभ,
इसको ये समझाना है।
मुश्किलों से व्यथित होकर,
इसको ना व्यर्थ गँवाना है।
समझ गया यह बात अगर तो,
जीवन में कभी न हारेगा,
खुद अपनी पतवार बनेगा,
औरों को भी तारेगा।
जाना है इसको दूर तक,
अभी से कमजोर बनाओ ना।
सुन लो इसके मन की बात,
यूँ इसको चुप कराओ ना।

रचयिता
सरस्वती उनियाल,
सहायक अध्यापिका, 
राजकीय आदर्श प्राथमिक विद्यालय डाकपत्थर,
विकास नगर-देहरादून,  
उत्तराखण्ड।

Comments

  1. बहुत सुंदर कविता बचपन महोदिया।

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  2. बचपन, बहुत सुंदर।

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  3. बहुत ही सरल शब्दों में बहुत कुछ समझा दिया आपने आपको साधुवाद

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  4. वाह्ह्हह्ह्ह्ह... लाजबाब सृजन.. आदरणीया 👍👍👌👏👏🌹🌺

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  5. बहुत सुन्दर

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