बचा ले पर्यावरण
हे दुष्ट मानव! अपने निज स्वार्थ सिद्धि हेतु,
इस सुंदर सृष्टि पर तूने प्रहार कर डाला।
पर्यावरण को तूने क्या से क्या कर डाला।
हवा को दूषित कर नदियों में भी कचरा डाला।
वाहनों, कारखानों के धुएँ से फिज़ाओं में जहर घोला।
धरा को सुशोभित करने वाले वनों को भी काट डाला।
जिन हरे-भरे वृक्षों से मिली तुझे प्राणवायु,
तूने उन्हीं वृक्षों का क्रूरता से संहार कर डाला।
माँ वसुंधरा धैर्य की प्रतिमा, तब भी तुझसे कुछ ना बोला।
थोड़ी सी विचलित क्या हुई धरा, हे मानव तू तो हिल गया।
बहुत घमंड हो चला था तुझे अपने बम परमाणु पर।
अब सोच जरा कैसे लगाएगा अंकुश इस विषाणु पर।
तू अपनी उड़ान की गति को थोड़ी धीमी कर ले।
इस सुंदर, मनोरम, उदार सृष्टि की भी थोड़ी फिक्र कर ले।
तू घरों में क्या रुका, हो गए साफ हवा, पानी, वसुंधरा।
समय रहते बचा ले पर्यावरण और सजने दे कुदरत की सुंदर दुनिया।
रचयिता
रेनू चौधरी,
सहायक अध्यापक,
कंपोजिट विद्यालय असालतनगर,
विकास खण्ड-मुरादनगर,
जनपद-गाजियाबाद।
इस सुंदर सृष्टि पर तूने प्रहार कर डाला।
पर्यावरण को तूने क्या से क्या कर डाला।
हवा को दूषित कर नदियों में भी कचरा डाला।
वाहनों, कारखानों के धुएँ से फिज़ाओं में जहर घोला।
धरा को सुशोभित करने वाले वनों को भी काट डाला।
जिन हरे-भरे वृक्षों से मिली तुझे प्राणवायु,
तूने उन्हीं वृक्षों का क्रूरता से संहार कर डाला।
माँ वसुंधरा धैर्य की प्रतिमा, तब भी तुझसे कुछ ना बोला।
थोड़ी सी विचलित क्या हुई धरा, हे मानव तू तो हिल गया।
बहुत घमंड हो चला था तुझे अपने बम परमाणु पर।
अब सोच जरा कैसे लगाएगा अंकुश इस विषाणु पर।
तू अपनी उड़ान की गति को थोड़ी धीमी कर ले।
इस सुंदर, मनोरम, उदार सृष्टि की भी थोड़ी फिक्र कर ले।
तू घरों में क्या रुका, हो गए साफ हवा, पानी, वसुंधरा।
समय रहते बचा ले पर्यावरण और सजने दे कुदरत की सुंदर दुनिया।
रचयिता
रेनू चौधरी,
सहायक अध्यापक,
कंपोजिट विद्यालय असालतनगर,
विकास खण्ड-मुरादनगर,
जनपद-गाजियाबाद।

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