सुरक्षित परिवेश

जल, थल, तरू व नभ,
बहता नीर, अविरल,
ये समाज का ताना-बाना,
यही है परिवेश जाना पहचाना,

सामंजस्य है इसमें बिठाना,
नहीं तो खतरा पडेगा उठाना,
यही बड़े बूढ़ों की ज़ुबानी,
हमने भी सुनी है कहानी,

सबक ले आई त्रासदी ये भारी,
 है उबरने की कमरकस तैयारी
समय रहते कसम है खानी,
हरी-भरी धरती है बनानी,

पेड़-पौधे हैं लगाने,
छूटे गाँव हैं बसाने,

अरे नर प्रकृति से डर,
उपयोग कर इसका इतना,
जरूरत है आत्मा को जितना,

तभी रहेगा सुरक्षित ये परिवेश,
फिर तू रह, चाहे देश या परदेश.

रचयिता
भावना पांडे,
सहायक अध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय कठघरिया,
विकास खण्ड-हल्द्वानी,
जनपद-नैनीताल,
उत्तराखण्ड।

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