नन्हें पंखों का ख़्वाब

मेरे नन्हें पंखों को,
आकाश बहुत ये भाता है।
पर ये नील वृहद आकाश,
हृदय को मेरे डराता है।।

माँ तेरा निःस्वार्थ प्रेम,
मुझको राह दिखाता है।
मेरे नाज़ुक पंखों को,
उड़ने के ख्वाब दिखाता है।।

भोर भानु रश्मि रथ लेकर,
द्वार पे मेरे आता है।
पुलकित मन मेरे पंखों को,
उड़ने को उकसाता है।।

माँ के तन की पीड़ा देख,
कुछ और मुझे न भाता है।
उड़कर माँ को दाना खिलाऊँ,
हर पल ख्वाब सताता है।।

मुझको उड़ते देख ख़ुशी से,
माँ का चेहरा दिख जाता है।
उसकी ख़ुशी से बढ़कर कुछ भी,
नज़र मुझे न आता है।।

रचयिता
पूजा सचान,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय मसेनी(बालक) अंग्रेजी माध्यम,
विकास खण्ड-बढ़पुर,
जनपद-फर्रुखाबाद।

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