करें धरती का श्रृंगार

  धरती का श्रृंगार करें
ताकि सदा रहे वह हरी-भरी

धरती माँ का ऋण चुकाए
बाग बगिया खूब लगाएँ
कुछ तुम सींचो, कुछ अंबर सींचें
ताकि सदा रहे वो हरी-भरी।

ममता से भरा, वसुधा का आँचल
नदियाँ, झरने, चाहे हो सागर
उसने सबको सींचा है
 सीने पर अन्न उगाया है।

जीव-जंतु सब मानव जाति
धरती सबकी सच्ची साथी
जाति-पाँति का भेद न करती
सबको जीवन अर्पित करती।

ईश्वर भी मानव बन आए
धरती माँ की शान बढ़ाएँ
मानव इनकी आन बचाओ 
धरती है जीवन की बगिया

 इनको तुम तड़पाओ ना
जीवन अपना गँवाओ ना
उस पर रहम दिखाओ ना 
ताकि सदा रहे वो वह हरी-भरी।

धरती का श्रृंगार करें
ताकि सदा रहे वह हरी-भरी

रचयिता                       
विजय लक्ष्मी यादव,
सहायक अध्यापक,
अभिनव इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल सिद्दिकीपुर-1
विकास खण्ड-करंजाकला,
जनपद-जौनपुर।

Comments

Total Pageviews